सोहनलाल द्विवेदी की कविताएं

सोहनलाल द्विवेदी की कविताएं

सोहनलाल द्विवेदी जी कुछ चुनी हुई कविताएं।

Sohanlal Dwiwedi

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती..!!

 — सोहनलाल द्विवेदी 

**********************************************************************************

बढे़ चलो, बढे़ चलो

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो..!!

 — सोहनलाल द्विवेदी 

**********************************************************************************

मातृभूमि

ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है..!!

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है..!!

वह पुण्य भूमि मेरी
वह स्वर्ण भूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी ..!!

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में..!!

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है..!!

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी ..!!

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता ..!!

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया ..!!

वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी,
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी ..!!

— सोहनलाल द्विवेदी 

**********************************************************************************

ओस

हरी घास पर बिखेर दी हैं
ये किसने मोती की लड़ियाँ?
कौन रात में गूँथ गया है
ये उज्‍ज्‍वल हीरों की करियाँ?

जुगनू से जगमग जगमग ये
कौन चमकते हैं यों चमचम?
नभ के नन्‍हें तारों से ये
कौन दमकते हैं यों दमदम?

लुटा गया है कौन जौहरी
अपने घर का भरा खजा़ना?
पत्‍तों पर, फूलों पर, पगपग
बिखरे हुए रतन हैं नाना।

बड़े सवेरे मना रहा है
कौन खुशी में यह दीवाली?
वन उपवन में जला दी है
किसने दीपावली निराली?

जी होता, इन ओस कणों को
अंजली में भर घर ले आऊँ?
इनकी शोभा निरख निरख कर
इन पर कविता एक बनाऊँ..!!

— सोहनलाल द्विवेदी 

**********************************************************************************

जी होता चिड़िया बन जाऊँ

जी होता, चिड़िया बन जाऊँ,
मैं नभ में उड़कर सुख पाऊँ,

मैं फुदक-फुदककर डाली पर,
डोलूँ तरु की हरियाली पर,
फिर कुतर-कुतरकर फल खाऊँ,
जी होता चिड़िया बन जाऊँ,

कितना अच्छा इनका जीवन?
आज़ाद सदा इनका तन-मन,
मैं भी इन-सा गाना गाऊँ,
जी होता, चिड़िया बन जाऊँ,

जंगल-जंगल में उड़ विचरूँ,
पर्वत घाटी की सैर करूँ,
सब जग को देखूँ इठलाऊँ,
जी होता चिड़िया बन जाऊँ,

कितना स्वतंत्र इनका जीवन?
इनको न कहीं कोई बंधन,
मैं भी इनका जीवन पाऊँ,
जी होता चिड़िया बन जाऊँ..!!

— सोहनलाल द्विवेदी 

Updated: September 30, 2017 — 9:37 pm

1 Comment

Add a Comment
  1. Best poems.Really impressed

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shayrana Dil © 2018 Shayrana Dil