Akbar History in Hindi 

Akbar History in Hindi Language

Akbar History in Hindi: Akbar was the third Mughal Emperor and one of the most famous emperors of Indian history which he successfully governed and expanded over the course of his reign. He was born in Umerkot ( India). He was the son of Emperor Humayun. Soon after coming to power Akbar defeated Hemu, the general of the Afghan forces, in the Second Battle of Panipat. Abu’l-Fath Jalal-ud-din Muhammad Akbar (15 October 1542– 27 October 1605), Akbar the Great, was the third Mughal emperor, who reigned from 1556 to 1605. In the Second Battle of Panipat. Let’s have a look at his life history, reign, administration, contribution, achievements and timeline. Mughal emperor Akbar was one of the greatest kings in the history of India. This biography profiles his childhood, life, rule, achievements. Jalaluddin Mohammad Akbar or Akbar The Great was the son of Nasiruddin Humayun. He was born on 15th October 1542 in the Rajput fortress. In 1582, King Philip II of Spain received a letter from the Mughal Emperor Akbar of India. Although Philip II did not heed Akbar’s call for religious tolerance.The Mughal emperor died on October 25th, 1605. Akbar was the third Mughal emperor Akbar also known as Shahanshah Akbar-e-Azam is mostly known as the greatest of the Mughal emperors of India. Akbar The Great (1542 – 1605) was the greatest of the Moghul emperors, creating an empire across India, promoting religious tolerance, culture and the arts. In this 1500s Akbar History, How Akbar died, The Last Days of Akbar the Great  It was October 25th, 1605. Ten days after his sixty-third birthday, the greatest. Mughal Emperor Jahangir was the son of Akbar.On September 9, 2013, By Bharat Mehta Category. Jalaluddin Muhammad Akbar (1542–1605), also known as Akbar the Great, was a Mughal.

Akbar history in Hindi

 

Akbar history in Hindi

पूरा नाम– अबुल-फतह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर
जन्म     – 15 अक्तुबर, 1542
जन्मस्थान – अमरकोट
पिता  हुमांयू
माता  –  नवाब हमीदा बानो बेगम साहिबा
शिक्षा –  अल्पशिक्षित होने के बावजूद सैन्य विद्या में अत्यंत प्रवीण थे।
विवाह – रुकैया बेगम सहिबा, सलीमा सुल्तान बेगम सहिबा, मारियाम उज़-ज़मानि बेगम सहिबा, जोधाबाई राजपूत।
संतान – जहाँगीर

अकबर  प्रारंभिक जीवन –

अकबर हुमायु के बेटे थे, जिन्होंने पहले से ही मुघल साम्राज्य का भारत में विस्तार कर रखा था। 1539-40 में चौसा और कन्नौज में होने वाले शेर शाह सूरी से युद्ध में पराजित होने के बाद मुघल सम्राट हुमायु पश्चिम की और गये जहा सिंध में उनकी मुलाकात 14 साल की हमीदा बानू बेगम जो शैख़ अली अकबर की बेटी थी। उन्होंने उनसे शादी कर ली और अगले साल ही जलाल उद्दीन मुहम्मद का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को राजपूत घराने में सिंध के उमरकोट में हुआ जहा उनके माता-पिता को वहा के स्थानिक हिंदु राना प्रसाद ने आश्रय दिया।

और मुघल शासक हुमायु के लम्बे समय के वनवास के बाद, अकबर अपने पुरे परिवार के साथ काबुल में रहने लगे। जहा उनके चाचा कामरान मिर्ज़ा और अस्करी मिर्ज़ा रहते थे। उन्होंने अपनी पूरी जवानी शिकार करने में, युद्ध कला सिखने में, लड़ने में, भागने में व्यतीत की जिसने उसे एक शक्तिशाली, निडर और बहादुर योद्धा बनाया। लेकिन अपने पुरे जीवन में उन्होंने कभी लिखना या पढना नहीं सीखा |

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ऐसा कहा जाता है की जब भी उन्हें कुछ पढने की जरुरत होती थी तो वे अपने साथ किसी को रखते थे जिसे पढना लिखना आता हो। 1551 के नवम्बर में अकबर ने काबुल की रुकैया से शादी कर ली। महारानी रुकैया उनके ही चाचा हिंदल मिर्ज़ा की बेटी थी। जो उनकी पहली और मुख्य पत्नी थी। उनकी यह पहली शादी अकबर के पिता और रुकैया के चाचा ने रचाई थी। और हिंदल मिर्ज़ा की मृत्यु के बाद हुमायु ने उनकी जगह ले ली।

शेर शाह सूरी से पहली बार पराजित होने के बाद, हुमायु में दिल्ली को 1555 में पुनर्स्थापित किया और वहा उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण किया। और इसके कुछ ही महीनो बाद हुमायु की मृत्यु हो गयी।

अकबर को एक सफल शक्तिशाली बादशाह बनाने के लिए अकबर के रक्षक ने उनसे उनके पिता की मृत्यु की बात छुपाई। और अंत में 14 फेब्रुअरी 1556 को सिकंदर शाह को पराजित कर अकबर युद्ध में सफल हुए और वही से उन्होंने मुघल साम्राज्य का विस्तार शुरू किया।

कलानौर, पंजाब में बैरम खान द्वारा 13 साल के अकबर को वहा की राजगद्दी सौपी गयी, ताकि वे अपने लिए एक नया विशाल साम्राज्य स्थापित कर सके। जहा उन्हें “शहंशाह” का नाम दिया गया। बैरम खान ने हमेशा अकबर का साथ दिया।

अकबर एक बहादुर और शक्तिशाली शासक थे उन्होंने गोदावरी नदी के आस-पास के सारे क्षेत्रो को हथिया लिया था और उन्हें भी मुघल साम्राज्य में शामिल कर लिया था। उनके अनंत सैन्यबल, अपार शक्ति और आर्थिक प्रबलता के आधार पर वे धीरे-धीरे भारत के कई राज्यों पर राज करते चले जा रहे थे।

अकबर अपने साम्राज्य को सबसे विशाल और सुखी साम्राज्य बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने कई प्रकार की निति अपनाई जिस से उनके राज्य की प्रजा ख़ुशी से रह सके।

उनका साम्राज्य विशाल होने के कारण उनमे से कुछ हिंदु धर्म के भी थे, उनके हितो के लिए उसने हिंदु सम्राटो की निति को भी अपनाया और मुघल साम्राज्य में लागू किया। वे विविध धर्मो के बिच हो रहे भेदभाव को दूर करना चाहते थे। उनके इस नम्र स्वाभाव के कारण उन्हें लोग एक श्रेष्ट राजा मानते थे। और ख़ुशी-ख़ुशी उनके साम्राज्य में रहते थे।

हिन्दुओं के प्रति अपनी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय देते हुए उन्होंने उन पर लगा ‘जजिया’ नामक कर हटा दिया। अकबर में अपने जीवन में जो सबसे महान कार्य करने का प्रयास किया, वह था ‘दिन-ए-इलाही’ नामक धर्म की स्थापना।

इसे उन्होंने सर्वधर्म के रूप में स्थापित करने की चेष्टा की थी। 1575 में उन्होंने एक ऐसे इबादतखाने (प्रार्थनाघर) की स्थापना की थी, जो सभी धर्मावलम्बियों के लिए खुला था, वो अन्य धर्मों के प्रमुख से धर्म चर्चायें भी किया करते थे।

साहित्य एवं कला को उन्होंने बहुत अधिक प्रोत्साहन दिया। अनेक ग्रंथो, चित्रों एवं भवनों का निर्माण उनके शासनकाल में ही हुआ था। उनके दरबार में विभिन्न विषयों के लिए विशेषज्ञ नौ विद्वान् थे, जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था।

अकबर को भारत के उदार शासकों में गिना जाता है। संपूर्ण मध्यकालीन इतिहास में वो एक मात्र ऐसे मुस्लीम शासक हुए है जिन्होंने हिन्दू मुस्लीम एकता के महत्त्व को समझकर एक अखण्ड भारत निर्माण करने की चेष्टा की।

भारत के प्रसिद्ध शासकों में मुग़ल सम्राट अकबर अग्रगण्य है, वो एकमात्र ऐसे मुग़ल शासक सम्राट थे, जिन्होंने हिंदू बहुसंख्यकों के प्रति कुछ उदारता का परिचय दिया।

धीरे-धीरे भारत में मुघल साम्राज्य का विस्तार होने लगा और स्थिर आर्थिक परिस्थिती राज्य में आ रही थी। अकबर कला और संस्कृति के बहोत बड़े दीवाने थे इसलिए उन्होंने अपने शासन काल में इन दोनों के विकास पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया। उन्हें साहित्य का भी बहुत शौक था इसलिए उन्होंने 2400 खंड लिखवाए और उन्हें ग्रंथालय में प्रकाशित भी किया।

उनकें साम्राज्य में कई भाषा के सैनिक थे जैसे की हिंदु, संस्कृत, ग्रीक, पर्शियन इत्यादि। अकबर ने हिंदु-मुस्लिम सम्प्रदायों के बिच की दुरिया कम करने के लिए दिन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की।

उनका दरबार सबके लिए हमेशा से ही खुला रहता था। अकबर ने अनेक फारसी संस्कृति से जुड़े चित्रों को अपनी दीवारों पर बनवाया। अपने आरंभिक शासन काल में अकबर की हिन्दुओ के प्रति सहिष्णुता नहीं थी, किन्तु समय के साथ-साथ उसने अपने आप को बदला और हिन्दुओ सहित अन्य धर्मो में भी अपनी रूचि दिखाई।

अकबर ने हिंदु राजपूत राजकुमारी से वैवाहिक भी किया। उनकी एक राणी जोधाबाई राजपूत थी। अकबर के दरबार में अनेक हिंदु दरबारी, सैन्य अधिकारी व सामंत थे। उसने धार्मिक चर्चाओ व वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी श्रुंखला आरम्भ की थी, जिसमे मुस्लिम आलिम लोगो की जैन, सीख, हिंदु, नास्तिक, पुर्तगाली एवम् कैथोलिक इसाई धर्मशास्त्रियो से चर्चा हुआ करती थी।

मुघल साम्राज्य में निच्छित ही भारतीय इतिहास को प्रभावित किया था। उनकी ताकत और आर्थिक स्थिति सतत तेज़ी से बढती जा रही थी। अकबर ने अपने आर्थिक बल से विश्व की एक सबसे शक्तिशाली सेना बना रखी थी, जिसे किसी के लिए भी पराजित करना असंभव सा था।

अकबर ने जो लोग मुस्लिम नहीं थे उनसे कर वसूल करना भी छोड़ दिया और वे ऐसा करने वाले पहले सम्राट थे, और साथ ही जो मुस्लिम नहीं है उनका भरोसा जितने वाले वे पहले सम्राट थे। अकबर के बाद, सफलता से उनका साम्राज्य उनका बेटा जहागीर चला रहा था।

अकबर मुघल साम्राज्य के महान और बहादुर सम्राटो में से एक थे। उन्होंने कभी मुस्लिम और हिंदु इन दो धर्मो में भेदभाव नहीं किया। और अपने साम्राज्य में सभी को एक जैसा समझकर सभी को समान सुविधाए प्रदान की। इतिहास में झाककर देखा जाए तो हमें जोधा-अकबर की प्रेम कहानी विश्व प्रसिद्द दिखाई देती है।

जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर अपनी प्रजा के लिए किसी भगवान् से कम नहीं थे। उनकी प्रजा उनसे बहोत प्यार करती थी। और वे भी सदैव अपनी प्रजा को हो रहे तकलीफों से वाकिफ होकर उन्हें जल्द से जल्द दूर करने का प्रयास करते। इसीलिए इतिहास में शहंशाह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर को एक बहादुर, बुद्धिमान और शक्तिशाली शहंशाह माने जाते है।

बाबर( 1526-1530)

बाबर ने 1526 में पानीपत  में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली से आगरा तक अपन अधिकार कर लिया |

बाबर ने मेवाङ के राजा राणा सांगा ,को हराकर भारत में मुग़ल शासन की स्थापना की |बाबर की सैनिक कार्य के साथ साथ साहित्य में भी रूचि थी इसलिए बाबर को कलम और तलबार दोनों का सिपाही कहा जाता है .बाबर के बाद उसके पुत्र हिमायूं को राजा बनाया गया.

हुमायूँ ( 1530-1540 तथा 1555-1556 )

1538 में हुमायूँ ने शेरशाह सूरी से चुनार जीत लिया | परंतु 1538 में शेरशाह और हुमायूँ के बीच दुबारा युद्ध हुआ यह बड़ा भयंकर युद्ध था जिसमे लाखो जान गयी और इस बार जीत शेरशाह सूरी की हुई और वह भारत का शासक बन गया। और हुमायूँ को अपने देश फारस लौटना पड़ा | परन्तु हुमायूँ अब भी दुबारा भारत पर अपना राज्य करना चाहता था और उसे वह मौका मिला शेरसाह की म्रक्तु के बाद, एक बार फिर हुमायूँ ने दिल्ली पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में ले लिया।

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सन 1526 ईस्वी में पानीपत के ऐतिहासिक रण स्थल में इब्राहिम लोदी को पराजित कर के बाबर ने एक दृष्टि से भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी, बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ सिंहासन पर बैठा परंतु इसी बीच शेरशाह सूरी के अभ्युदय से उत्तरी भारत की राजनीतिक सत्ता सूरवंश के हाथों में आ गई | शेरशाह सूरी हिंदुस्तान का बादशाह बन गया, परंतु उसके उत्तराधिकारी सर्वथा अयोग्य निकले और जल्द ही सूर वंश का पतन हो गया और भारत में पुनः मुगल राजवंश का सूर्य कमल खिल उठा हुमायूँ की मृत्यु के उपरांत मुगल राजवंश के तृतीय शासक का उदय होता है और यह तृतीय शासक था- सम्राट अकबर

अकबर बादशाह हुमायूँ का पुत्र था और उसकी माता का नाम हमीदा बानू बेगम था| अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 ई. को अमर कोट के राजा वीरसाल के महल में हुआ था, इतिहास के अनुसार हुमायूँ की स्थिति बहुत ही दयनीय थी क्यूकी वह शेरशाह सूरी से पराजित हो गया था। अकबर का प्रारंभिक जीवन बहुत ही कठिनाइयों में व्यतीत हुआ, जब उसका जन्म हुआ था तो उसके पिता हुमायूँ के पास उसका जन्मोत्सव मानने के लिए कुछ नही था, उसके पास केवल एक कस्तूरी थी जिसको तोड़कर हुमायूँ ने अपने सरदारों मे बाँटा था। कस्तूरी एक ऐसा पदार्थ है जिसमें एक तीक्ष्ण गंध होती है और यह नर मृग में स्थित एक ग्रंथि से प्राप्त होती है|

अकबर के जन्म के पश्चात हुमायूँ को भारत से पलायन करना पड़ा था, जिस समय हुमायूँ ने फारस के लिए प्रस्थान किया, उस समय अकबर की आयु मात्र 1 वर्ष की थी इसलिए हुमायूँ उसे अपने भाई अस्करी के पास कंधार में छोड़ गया। 1545 में अकबर को हुमायूँ की बहन खानजादा बेगम के साथ काबुल भेज दिया गया, 15 नवंबर 1545 को हुमायूँ ने कामरान से काबुल जीत लिया, इस जीत के बाद अकबर हुमायूँ के पास आ गया। 1546 काबुल पुनः कामरान के पास आ जाने से अकबर भी कामरान के ही संरक्षण में पड़ गया। अप्रैल 1547 ईस्वी में हुमायूँ ने पुनः काबुल दुर्ग पर चढ़ाई करके घेरा डाल दिया और वहां भयंकर गोलीबारी हुई। गोलाबारी के समय कामरान ने अकबर को किले की दीवार पर बिठा दिया था किंतु सौभाग्य से अकबर बच गया और काबुल पर हुमायूँ का पुनः अधिकार हो गया। 1551 ईस्वी में भारत लौटने पर हुमायु ने अकबर को लाहौर का गवर्नर बना दिया और बैरमखाँ को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। 

अकबर महान का सिंहासनारोहण

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जब हुमायूँ की मृत्यु हुई, तब अकबर पंजाब में था जहां वह बैरमखां के साथ वहां के सूबेदार अबुलमाली के आतंक एवं कुप्रबंध का अंत करने गया था, पंजाब से लौटते हुए कलानौर में उसे अपने पिता हुमायूँ की अकाल मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार सुनकर अकबर बहुत ही दुखी हुआ और उस समय उसके सबसे विश्वास पात्र सरदार बैरम खान ने उसे धैर्य बँधाया, बैरम खान ने सरदारों को शोक बनाने की विधियां पूरी करने को कहा। शोक मनाने की विधियां पूर्ण होने के पश्चात सरदारों ने अकबर के राज्य अभिषेक की तैयारी की, और बैरम खान ने 14 जनवरी 1556 ई0  को एक साधारण बाग में महान सम्राट अकबर का राज्यारोहण किया, और हुमायूँ की राजगद्दी पर उसे बिठाया| जिस समय अकबर सिंहासन पर विराजमान हुआ उस समय उसकी उम्र केवल 13 वर्ष की थी, और उसे राज्य कार्य में बहुत अधिक अनुभव नहीं था, इसीलिए उसके पिता का विश्वास पात्र सरदार एवं मित्र बैरमखां राज्य की देखभाल करने लगा।

अकबर की मृत्यु-

अकबर मुगल वंश का सम्राट था, वह मुगल के अतिरिक्त अन्य सभी धर्मों के प्रति आदर एवं सम्मान का भाव रखता था, और वह सभी धर्मों के प्रति उदार था| इन्हीं कारणों से अकबर ने एक नया धर्म “दीन-ए-इलाही” की स्थापना की| उसने फतेहपुर सीकरी में एक इबादत खाना का निर्माण करवाया जिसे प्रार्थना गृह कहा जाता है| इस इबादत खाने में वह सभी धर्मों एवं संप्रदायों के व्यक्तियों से धार्मिक चर्चाएं करता था| मुगल वंश के महान सम्राट अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर सन 1605 ईस्वी में हुई|

सम्राट अकबर का शासन प्रबंध-

राज गद्दी पर बैठने के लगभग 4 वर्ष पश्चात 1560 ई में अकबर ने स्वतंत्रता पूर्वक अपना शासन कार्य आरंभ किया| उसने 1562 ईस्वी में युद्ध में पकडे गए सिपाहियों एवं आम जनता को गुलाम बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया| 1563 ईस्वी में उसने तीर्थ यात्रा पर लगने वाले कर (जिसको की तीर्थ यात्री कर कहा जाता था) को भी समाप्त कर दिया| सन 1564 ईस्वी में उसने हिंदुओं से लिया जाने वाला जजिया कर समाप्त कर दिया|
अकबर ने अपनी राज्य का विस्तार करने एवं संपूर्ण भारत को जीतने के लिए दल, बल, मित्रता तथा भेद की नीतियों का सहारा लिया| मालवा, चुनार, मेरठ, रणथंभोर, जौनपुर, गोंडवाना, मारवाड़, कालिंजर, गुजरात, बंगाल, कश्मीर, बिहार, काबुल, सिंध, उड़ीसा तथा दक्षिण भारत की भागों पर उसने विजय प्राप्त कर ली| इस तरह से उसने लगभग संपूर्ण भारत पर अपनी विजय प्राप्त कर ली परंतु चित्तौड़ पर अभी भी उसकी विजय नहीं हुई थी| 1567-68 ईस्वी में महाराणा प्रताप से एक लंबे संघर्ष के बाद उसका चित्तौड़ पर अधिकार हो गया| राजपूत राजाओं ने जयमल और पत्ता के नेतृत्व में अकबर को कठिन चुनौतियां प्रस्तुत की थी। जिसमें गोंडवाना राज्य की रानी दुर्गावती एवं मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप प्रमुख थे।

सम्राट अकबर की नीतियां-

अकबर एक कुशल शासक, राजनीतिज्ञ एवं चतुर सम्राट था। वह जानता था कि हिंदू राजाओं एवं हिंदुओं के सहयोग के बिना वह अपना राज्य विस्तार नहीं कर सकता है, और जिन राज्यों पर उसने अभी तक अपना अधिकार किया है उन पर अधिकार बनाए रखने के लिए उसे हिंदुओं की आवश्यकता पड़ेगी| इसीलिए उसने अपने राज्य में कई हिंदुओं को मनसबदार बनाया| इन मनसबदारों में अधिकतर राजा राजपूत थे| इन राजपूत राजाओं से उसने व्यक्तिगत एवं वैवाहिक संबंध स्थापित किए| उसने भगवान दास, बीरबल, टोडरमल, राजा मानसिंह एवं अंय कई राजपूत राजाओं को उच्च मनसब प्रदान किए| उसने हिंदुओं के लिए अलग से नीतियां बनाई और बीकानेर, आमेर, जैसलमेर जैसे राजघरानों की राज कन्याओं से विवाह किया| और कालांतर में उसकी यह नीति उसके लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई| इसके अतिरिक्त जिन राजपूत राजाओं ने अकबर की इस नीति और अधीनता को अस्वीकार किया उनके विरुद्ध उसने युद्ध किए| अकबर की अधीनता स्वीकार करने में मेवाड़ के महाराणा प्रताप का नाम सर्वोच्च है| महाराणा प्रताप के विरुद्ध उसने युद्ध का निर्णय लिया और अकबर एवं महाराणा प्रताप की सेनाओं के मध्य 21 जून सन 1576 ईस्वी में हल्दीघाटी के प्रसिद्ध मैदान में युद्ध हुआ|

जलाल उद्दीन अकबर जो साधारणतः अकबर और फिर बाद में अकबर एक महान के नाम से जाने जाते थे, वे 1556 से उनकी मृत्यु तक मुघल साम्राज्य के शासक थे। वे भारत के तीसरे और मुघल के पहले सम्राट थे।

अकबर  महान (1556-1605)

जब हुमायूँ की म्रक्तु हुई उस समय  अकबर केवल 13 साल का था | हिमायूं के विश्वास पात्र बैरम खान ने अकबर का राजभिषेक किया और उम्र कम होने के कारन अकबर बैरम खान (Bairam Khan) की देखरेख में राज काज करने लगा।

पानीपत का द्वितीय युद्ध

आदिल साह सूरी के सेनापति हेमू ने दिल्ली पर अकर्मण करके उसे जीत लिया  , इसे मुक्त करने के लिए 1556 में अकबर और हेमू के बीच पानीपत का युद्ध हुआ , हेमू की सेना हार  गयी और पंजाब आगरा और दिल्ली अकबर के अधिकार में हो गए |

Akbar का साम्राज्य विस्तार

अकबर एक बहुत समझदार शाशक था वह सोचता था जब तक युद्ध अनिवार्य न हो युद्ध न किया जाये इसलिए उससे अपने राज्य को बढ़ाने के और भी तरीके निकाले जैसे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने , अधीनता स्वीकार करने ,वालो को शासन में पद देने तथा मित्रता करने की नीति अपनयायी .

अकबर राजपूतो के साथ मित्रता का महत्त्व समझता था इसलिए उसने राजपूत परिवारों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर स्थिति को मजबूत किया और इसके लिए उसने जोधा बाई (Jodha Bai ) से विवाह भी किया .और जोधबाई और अकबर के पुत्र जहाँगीर ही अकबर Akbar के बाद मुग़ल बादशाह Mugal Badshah बना | इसतरह जोधा अकबर की प्रेम कहानी इतिहास में अमर प्रेम कहानी बन गयी

अकबर ने आमेर , जोधपुर , बीकानेर ,जैसलमेर , के राजपूतो को दरवार में सम्मान जनक स्थान दिया . राजपूत राजा भगवान् दास तथा उनके पोते मानसिंह को दरवार में सबसे ऊँचा स्थान दिया | उसने हिंदुयो का जजिया कर की समाप्त कर हिंदुयो को खुश किया | जिससे हिन्दू अकबर पर विस्वास करने लगे।

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कई राजपूतो ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली पर कुछ राजपूत ऐसे भी थे जो अकबर के अधीन नहीं होना चाहते थे जैसे मेवाड़ के महाराजा माहाराणा प्रताप , जब महाराणा प्रताप ने अकबर के सामने झुकने से मना कर दिया तो अकबर Akbar ने माहाराणा प्रताप पर हमला कर दिया और यह युद्ध सं 1576 में हल्दीघाटी Haldighati के मैदान में हुआ जो भारतीय इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है | माहाराणा प्रताप युद्ध करते हुए बुरी तरह घायल हुए , और उन्हें परिवार सहित जंगल जाना पढ़ा उन्होंने वचन लिया जब तक वह मेवाड़ को वापस नहीं ले लेंगे , वह घास की रोटी खाएंगे | जमीन पर सोएंगे और सभी सुखो का त्याग कर देंगे,
माहाराणा प्रताप ने २० वर्षो के कठोर परिश्रम से देवर , उदयपुर आज़ाद करा लिए परंतु चित्तोड़ , व अजमेर अकबर के कब्जे में ही रहा ,अकबर ने अपने साम्राज्य के बढ़ाने के लिए अन्य विजय भी की यूरोप , अरब , दक्षिण एशिया से व्यपार की दृष्टि से बंगाल और गुजरात प्रान्त बहुत महत्वपूर्ण थे जिन पर अकबर ने अपना अधिकार कर लिया इससे राज्य की आमंदनी बढ़ी , दक्षिण में अकबर का एहमद नगर की रानी चांदबीबी से युद्ध हुआ . अकबर ने एहमद नगर के कुछ भागो को अपने अधिकार में कर लिया |

इस तरह अकबर ने एक विशाल साम्राज्य की स्थपना की , जो कश्मीर से अहमदनगर और काबुल से बंगाल तक फैला हुआ था |

अकबर ने साम्राज्य के प्रशासन को सही से चलने के लिए साम्राज्य को कई स्तर में बाँट दिया | और उसके लिए अधिकारियो को नियुक्त कर दिया

अकबर के राज्य में आय के 2 ही साधन थे भूमि का लगान और व्यापर पर कर | किसानों से उपज का 1 तिहाई भाग लगन के रूप में लिया जाता था |

अकबर द्वारा किये गए सामाजिक कार्य

अकबर जनता था हिंदुयो के सहयोग के बिना वह भारत में अपने राज्य का विस्तार नही कर सकता , इसलिए उसने हिंदुयो को अपनी सेना में उचे पद दिए |  राजपूतो से व्यवहायिक सम्बन्ध बनाये |

अकबर की धार्मिक सहिसुरता का परिचय फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना के निर्माण से पता चलता है , जिसमे वह सभी धर्मो , के गुरुओ से उनके धर्म की अच्छी अच्छी बातो को सुनता और उन पर चर्चा करता |

उसने इस्लाम हिन्दू , फ़ारसी , जैन , ईसाई अदि धर्मो की अच्छी बातो को लेकर एक आये धार्मिक मार्ग दीन- ए- इलाही की रूप रेखा बांयी जिसका उद्देश्य एकता स्थापित करना था | अकबर ने सुलह कुल की नीति अपनायी जिससे इतने बढे राज्य का काम शांति पूर्ण ढंग से चल सके तथा सबका समर्थन मिल सके | इस नीति को अकबर के बाद आने वाले मुगल बादशाहो (Mughal Badshah ) ने भी अपनाया | इस नीति का अनुसरण करते हुए अकबर ने गीता , महाभारत , अथर्ववेद , बाइबिल , कुरान , पंचतंत्र और कई पुस्तको का फ़ारसी में अनुबाद में कराया

अकबर ने हिंदुयो पर से यात्रा तथा जजिया कर हटा लिया | उसने गैर मुसलमानो के धर्म परिवर्तन की प्रथा को समाप्त किया | इन कार्यो से उसने एक ऐसे साम्राज्य की आधार सिला राखी जो बिना किसी भेदभाव के सभी लोगो के सामान अधिकारों पर आधारित था .

इस प्रकार अकबर के शासन काल में राज्य धर्मनिरपेक्ष , सामजिक विषयो में उदार और चेतना तथा  सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा बन गया |

अकबर सदैव विधानों से विचार विमर्श करता था | सी समय की राज्य भाषा फ़ारसी थी | इस समय अबुलफजल , फैजी Faizi उच्चकोटि के लेखक थे | अबुलफजल Abul Fazal ने अकबर नामा की रचना की .

महाभारत तथा रामायण का फ़ारसी में अनुवाद किया | अब्दुल रहीम खानखाना के हिंदी में लिखे दोहे आज भी प्रसिद्ध है .तुलसीदास Tulsidas  ने रामचरित मानस Ramcharit Manas की रचना भी इसी समय की थी | इस समय देश में कागज पर लिखने का कार्य प्रारम्भ हो चूका था | प्रमुख संगीतकार तानसेन भी अकबर के ही दरबारियो में थे |

अकबर की कला में रूचि

अकबर कला का बहुत शौक़ीन था . अकबर ने आगरा के पास  फतेहपुर सीकरी  नमक  नगर बनाया और इसे कुछ सालो   के लिए अपनी राजधानी  भी बनाया  | अकबर ने आगरा में एक किला Red fort Agra , हवा  लेने  के लिए पपंचमजिल वाला पञ्च  महल  फहेदपुर  सीकरी  में बनाया | आगरा किला में दीवाने  आम और दीवाने  खास का निर्माण कराया जिसमे दीवाने  आम  में राज्य के लोगो से मुलाकात  करता था  | दीवाने  खास  में अपने मंत्रियो  से शासन संभंधित  बात करता | फहेदपुर  सीकरी में बुलंद  दरवाजा , गुजरात  विजय स्मारक  के रूप में बनवाया  | तथा शेख सलीम  चिस्ती  की दरगाह का निर्माण कराया .

अकबर के पुत्र का नाम सलीम था जिसे अकबर की म्रक्तु  के बाद जहाँगीर नाम से  राजा बनाया गया |

Akbar Family Tree OR Mughal Emperor Family Tree

बाबर ( 1526-1530)

हिमायूं ( 1530-1540 तथा 1555-1556 )

अकबर  (1556-1605)

जहाँगीर Jahngeer (1605-1627)

शाहजहां  (1628 – 1658)

औरंगजेब  (1658 – 1707)

 Akbar के बारे में हमने सबने किताबों में पढ़ा है जिसे हम अकबर महान के नाम से जानते है लेकिन आप में से बहुत कम लोग होंगे जो ये जानते हो कि उसे अकबर को महान कहे जाने के पीछे एक कारण है जिसकी वजह से उसे इतिहास का एक महान सम्राट कहा जाता है तो चलिए इसी बारे में आज बात करते है और जानते है Akbar की जिदंगी से जुडी कुछ खास बातें जो हो सकता है आपको पता भी हो और कुछ ऐसी भी जो आपको नहीं पता हो तो चलिए बात करते है Akbar history से जुडी कुछ जानकारियों पर –

Akbar को असल में महान इसलिए नहीं कहा जाता कि उसका राज्य बहुत बड़ा था या फिर वह केवल एक कुशल सम्राट था और अगर हम इतना ही जानते है तो यह एक अधूरी सच्चाई है क्योंकि अकबर को महान कहे जाने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है उसकी “ धार्मिक सहिष्णु “ होना | असल में अकबर से पहले जितने भी सम्राट हुए है या बाद में भी हुए है वो धार्मिक तौर पर बेहद कट्टर हुए है लेकिन Akbar के मामले में ऐसा नहीं है | हालाँकि उसने बेहद कुशलता के साथ अपने सैन्य ताकत को बढाते हुए अपने राज्य का विस्तार किया और लोगो का परिचय मुस्लिम धर्म से करवाया जैसा कि हमने Srinagar History में पढ़ा था पर उसकी नीतियां धर्म के प्रति कट्टर नहीं थी और लोगो को धार्मिक आजादी थी | अपने शासन के शुरुआत में Akbar थोडा अलग किस्म का था लेकिन समय के साथ उसमे परिपक्वता आ गयी और यही कारण है कि इतिहास उसे एक महान सम्राट के तौर पर याद रखता है |

October 15, 1542 अमरकोट नाम की जगह जो कि सिंध प्रदेश में पड़ती थी में  Akbar का जन्म हुआ और केवल 14 साल की उम्र में ही उसे शासन मिल गया | अपने शासन काल में अकबर ने अपनी सैन्य शक्ति का भरपूर बढ़ावा किया और इतिहास में वह एक शानदार लीडर के तौर पर जाना जाता है क्योंकि उसकी सैन्य नेतृत्व की अद्भुत प्रतिभा थी | अब ये बात करें कि Akbar को राजगद्दी कैसे मिली तो इस बारे में history कहती है कि अकबर चंगेज खान के वंशज थे और बाबर जो है वो मुग़ल सम्राज्य के पहले राजा थे और पिता हुमायूं को चूँकि शेर शाह सूरी ने युद्ध में हरा दिया था दिया था इसलिए उनसे राजगद्दी छीन गयी लेकिन 1555 में किसी तरह हुमायूं ने फिर से सत्ता हासिल कर ली पर कुछ ही दिन वह राज कर पाया क्योंकि उसकी मौत हो गयी थी जिसकी वजह से अकबर को राजगद्दी विरासत के तौर पर हासिल हुई |

Akbar History in Hindi Language

हालाँकि जिस समय Akbar को राजगद्दी मिली उस समय मुग़ल साम्राज्य के हाल कुछ ज्यादा अच्छे नहीं थे लेकिन जल्दी ही बैरम खान के साथ होने की वजह से अकबर ने अपने राज्य को स्थायित्व प्रदान किया |  विशेषकर बैरम खान ने अफगानों से उत्तरी भारत पर कब्ज़ा कर लिया और पानीपत की दूसरी लड़ाई में हिंदू राजा हेमू के खिलाफ सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।

इस वफादार सेवा के बावजूद 1560 में अकबर ने साम्राज्य को पूर्ण नियंत्रण में कर लिया और बैरम खान के राज-प्रतिनिधि के पद को ख़ारिज कर दिया | चूँकि अकबर एक चतुर राजा था और उसके साम्राज्य के विस्तार की बात करें तो उसकी मृत्यु तक उसका साम्राज्य उत्तर में अफगानिस्तान, पश्चिम में सिंध, पूर्व में बंगाल, और दक्षिण में गोदावरी नदी तक फैला था।

उसके साम्राज्य के इतने फैले होने और संगठित होने के पीछे एक कारण यह भी था कि Akbar ने जिन जिन प्रदेशों को अपने नियंत्रण में लिया वंहा के लोगो के प्रति उसके मन में ईमानदारी और न्यायपूर्ण भावना थी और जन्हा जन्हा उसने अपने प्रदेश का विस्तार किया तो अपने द्वारा हराए गये राजाओं के साथ भी उसके सम्बन्ध स्थापित किये और उनसे मोटा टैक्स वसूलने या उन्हें नियंत्रण में लेने की बजाय उसने एक केंद्रीय शासन प्रणाली को अपनाया जिसमे छोटे राजा अपने राज्यों के साथ उसकी रियासतों के तौर पर गिने जाते थे और उसके अधीन भी थे | अकबर के बारे में यह कहा जाता है कि वह धार्मिक विचारों के प्रति उदार था और प्रतिभाशाली लोगो को ईनाम दिए जाने के लिए भी महशूर था | इन सभी कारणों की वजह से वह इतना कुछ कर पाया कि दूसरा कोई भी मुग़ल शासक नहीं कर पाया | उसने दूसरे राजाओं की तरह हिन्दुओं को मुस्लिम बनने पर मजबूर नहीं किया और  गैर-मुस्लिमों पर मतदान कर को खत्म करना, हिंदू साहित्य का अनुवाद करना और हिंदू त्योहारों में भाग लेना आदि के जरिये वह अपनी प्रजा के मन को जीतना चाहता था | इसके साथ ही उसने हिन्दू राजाओं के साथ वैवाहिक गठबंधन भी बनाये जिसमे आप जोधा बाई के बारे में भी पढ़ते है और साथ ही उनके पिता और भाईओं को अपने दरबार में जगह दी और उनके लिए वही सम्मान स्थापित किया जो वो अपने मुस्लिम भाइयों के साथ करते थे जिसकी वजह से अकबर ने वह पुरानी प्रथा और कलंक को साफ़ कर दिया जिसमे मुस्लिम राजा हिन्दू राजाओ को हराकर उनकी बेटियों से शादी करके अपमानजनक स्थिति बना दिया करते थे | 1574 ने अकबर ने अपने टैक्स सिस्टम को सुधारते हुए एक केन्द्रीय व्यवस्था का निर्माण किया जिसमे सभी रियासतें अलग अलग तरह के टैक्स को कलेक्ट करने के बाद उसे केन्द्रीय प्रशासन को दे दिया करती थी जिसकी वजह से उनके पास धन संग्रह नहीं होने के बाद वह केंद्रीय प्रशासन पर ही निर्भर हुआ करती थी |

Akbar के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो वह धार्मिक तौर पर बहुत ही जिज्ञासु था और अक्सर दूसरे धर्म के त्योहारों को अटेंड किया करता था | उसने 1575 में फतेहपुर सीकरी में एक दीवार वाले शहर को फ़ारसी शैली में डिजाइन किया था जिसके बारे में आप यंहा क्लिक करके पढ़ सकते है |साथ ही उसने अपनी सहिष्णु विचारों के चलते आगरा में चर्च बनाने की भी अनुमति दे दी | हालाँकि उसके इस बोल्ड मूव को सराहना भी बहुत मिली लेकिन उस समय के कुछ लोगो ने अकबर को अधर्मी करार भी दिया था | अपने अंतिम दिनों में उसने 1582 में एक नये पंथ “ दीन ए इलाही “ की स्थापना की जिसमे सभी धर्मो की शिक्षाएं और संकल्प शामिल थे लेकिन यह उतना सफल नहीं हो सका और 1605 में  उसकी मौत के साथ ही ख़त्म भी हो गया |

Akbar पिता हुमायूं और दादा बाबर की तरह वह कोई कवि या डायरी लिखने वालों में से नहीं था और इतिहासकरों के अनुसार वह अनपढ़ था लेकिन उसने अपने राज्य में कला , संगीत और लेखन को प्रोत्साहन करने उन्हें सींचने का बेहतरीन काम किया है अकबर को जाना जाता है उसकी मुग़ल वास्तुकला के प्रेम के लिए जिसमे इस्लामिक , फारसी और हिन्दू कलाओं का भी मिश्रण है और साथ ही उसके दरबार की कुछ खास लोगो के लिए जिसमे बहुत शानदार कलाकार , इंजिनियर , संगीतज्ञ और दर्शन-शास्त्री शामिल थे |

जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर तैमूरी वंशावली के मुगल वंश का तीसरा शासक था।अकबर को अकबर-ऐ-आज़म (अर्थात अकबर महान), शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है। सम्राट अकबर मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का पौत्र और नासिरुद्दीन हुमायूं एवं हमीदा बानो का पुत्र था। बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था।अकबर के शासन के अंत तक १६०५ में मुगल साम्राज्य में उत्तरी और मध्य भारत के अधिकाश भाग सम्मिलित थे और उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। बादशाहों में अकबर ही एक ऐसा बादशाह था, जिसे हिन्दू मुस्लिम दोनों वर्गों का बराबर प्यार और सम्मान मिला। उसने हिन्दू-मुस्लिम संप्रदायों के बीच की दूरियां कम करने के लिए दीन-ए-इलाहीनामक धर्म की स्थापना की। उसका दरबार सबके लिए हर समय खुला रहता था। उसके दरबार में मुस्लिम सरदारों की अपेक्षा हिन्दू सरदार अधिक थे। अकबर ने हिन्दुओं पर लगने वाला जज़िया ही नहीं समाप्त किया, बल्कि ऐसे अनेक कार्य किए जिनके कारण हिन्दू और मुस्लिम दोनों उसके प्रशंसक बने।अकबर मात्र तेरह वर्ष की आयु में अपने पिता नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायुं की मृत्यु उपरांत दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा था। अपने शासन काल में उसने शक्तिशाली पश्तून वंशज शेरशाह सूरी के आक्रमण बिल्कुल बंद करवा दिये थे, साथ ही पानीपत के द्वितीय युद्ध में नवघोषित हिन्दू राजा हेमू को पराजित किया था। अपने साम्राज्य के गठन करने और उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एकछत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गये थे। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया। सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुल हिन्दू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाये और उनके यहाँ विवाह भी किये।

Akbar History in Hindi Language

अकबर के शासन का प्रभाव देश की कला एवं संस्कृति पर भी पड़ा। उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफ़ी रुचि दिखाई और उसके प्रासाद की भित्तियाँ सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थीं। मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया। उसे साहित्य में भी रुचि थी और उसने अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद भी करवाया था। अनेक फारसी संस्कृति से जुड़े चित्रों को अपने दरबार की दीवारों पर भी बनवाया। अपने आरंभिक शासन काल में अकबर की हिन्दुओं के प्रति सहिष्णुता नहीं थी, किन्तु समय के साथ-साथ उसने अपने आप को बदला और हिन्दुओं सहित अन्य धर्मों में बहुत रुचि दिखायी। उसने हिन्दू राजपूत राजकुमारियों से वैवाहिक संबंध भी बनाये।अकबर के दरबार में अनेक हिन्दू दरबारी, सैन्य अधिकारी व सामंत थे। उसने धार्मिक चर्चाओं व वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी शृंखला आरंभ की थी, जिसमें मुस्लिम आलिम लोगों की जैन, सिख, हिन्दु, चार्वाक, नास्तिक, यहूदी, पुर्तगाली एवं कैथोलिक ईसाई धर्मशस्त्रियों से चर्चाएं हुआ करती थीं। उसके मन में इन धार्मिक नेताओं के प्रति आदर भाव था, जिसपर उसकी निजि धार्मिक भावनाओं का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ता था।उसने आगे चलकर एक नये धर्म दीन-ए-इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था। दुर्भाग्यवश ये धर्म अकबर की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता चला गया।

इतने बड़े सम्राट की मृत्यु होने पर उसकी अंत्येष्टि बिना किसी संस्कार के जल्दी ही कर दी गयी। परम्परानुसार दुर्ग में दीवार तोड़कर एक मार्ग बनवाया गया तथा उसका शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफना दिया गया।

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