Bajirao Mastani History In Hindi

Bajirao Mastani History In Hindi

Bajirao Mastani History in Hindi: Mastani’s child was named Shamsher Bahadur and Kashibai’s child was named Raghunath Rao who was named Krishna Rao at birth. Bajirao bestowed the Jagir of Banda on Peshwa. Bajirao’s love for his half-Muslim wife Mastani and neglect of Kashibai angered his mother, Radhabai. After the death of Bajirao, Mastani died soon in 1740 and Kashibai took Shamsher Bahadur, the 6-year-old boy under her care and raised him as one of her own and made facilities to train him in weaponry. The love story of Bajirao and Mastani is one of the most interesting love stories in history. But like many love stories, their’s too was tragic. Bajirao Mastani Real Love Story – Conspicuous theories around Bajirao Mastani love story. Bajirao was the Peshwa during 1720-1740. Why does history know very less about Mastani and Peshwa Bajirao’s love story? History only tells us that Bajirao and Mastani existed and were married to each other Bajirao and Mastani’s love story is widely known in Maharashtra. Peshwa Bajirao was the greatest leader of the Maratha Empire after Shivaji. Peshwa Bajirao married Mastani, the daughter of Bundela king. Baji Rao falls in love with Mastani she was a Muslim girl.

Bajirao Mastani story in Hindi

ऐसे कई सारे प्रसंग मस्तानी के जीवन से जुड़े है, छत्रसाल के दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो, वो हैदराबाद के निज़ाम की कन्या थी। छत्रसाल ने निज़ाम को 1698 में पराजित किया था, और निजाम की पत्नी ने बुन्देल और उनके बिच अच्छे सम्बन्ध स्थापित होने हेतु उनकी बेटी से विवाह करने की सलाह दी क्यूकी उस समय मध्य भारत में छत्रसाल साम्राज्य सबसे सशक्त और शक्तिशाली साम्राज्य था।

पूरा नाम  – बाजीराव बल्लाल (बालाजी ) भट्टBajirao Mastani History in Hindi
जन्म     – 18 अगस्त 1700
जन्मस्थान – कोकणस्थ प्रान्त
पिता     –  बालाजी विश्वनाथ
माता     – राधाबाई बर्वे
पत्नीं      – काशीबाई और मस्तानी

पेशवा बाजीराव प्रथम हिंदुस्तान में मराठा साम्राज्य का एक महान सेनापति था | उसने 1720 से लेकर अपनी मौत तक  चौथे मराठा छत्रपति साहू के पेशवा के रूप में सेवा की | उसके अन्य नामो में उसे बाजीराव बल्लाल आयर थोराले बाजीराव भी कहते है | बाजीराव ने अपने सैन्य काल में मराठा साम्राज्य को चरम सीमा तक पहुचाया था जो उसकी मौत के बीस साल बाद भी उसके पुत्र के शासन में बना रहा | अपने 20 साल के छोटे सैन्यवृति में बाजीराव ने एक भी जंग नही हारी | एक अंग्रेज अफसर ने तो बाजीराव को हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन घुड़सवार सेना का सेनापति बताया है | वैसे बाजीराव मस्तानी फिल्म के जरिये बाजीराव (Peshwa Bajirao) के शौर्य के बारे में आपको काफ़ी जानकारी मिली होगी लेकिन फिर भी उसके शौर्य को सदैव जीवित रखने के लिए हम उसकी जीवनी से आपको रुबुरु करवाते है |

 बाजीराव का प्रारम्भिक जीवन

बाजीराव का जन्म कोकनष्ठ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट्ट परिवार में 18 अगस्त 1700 को हुआ था | उसके पिता बालाजी विश्वनाथ ,छत्रपति साहू के प्रथम पेशवा थे और माँ का नाम राधाबाई था | बाजीराव के छोटे भाई का नाम चिमाजी अप्पा था | बाजीराव बचपन में ही अपने पिता के सैन्य अभियानों में उनके साथ जाते थे | जब 1720 में बाजीराव के पिता विश्वनाथ की मौत हो गयी तब छत्रपति साहू ने 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त कर दिया | उसने हिन्दू साम्राज्य का भारत में प्रसार किया था |  बाजीराव दिल्ली की दीवारों पर मराठा ध्वज लहराना चाहता था और मुगल साम्राज्य को समाप्त कर हिन्दू-पत-पदशाही साम्राज्य स्थापित करना चाहता था |

कम उम्र में ही मिला पेशवा का पद

जब बाजीराव को पेशवा बनाया गया तब छत्रपति साहू पद के साथ सतारा में अपने महल तक सिमित रहते थे | मराठा महासंघ उनके नाम से चलता था लेकिन असली शक्ति पेशवा के हाथ में होती थी | बाजीराव की नियुक्ति के समय मुगल बादशाह मुहम्मद शाह शिवाजी की मृत्यु तक उनके अधीनस्थ इलाको पर वापस कब्जा करना चाहता था | 1719 में मुगल दक्कन के छ प्रान्तों से कर लेने का अधिकार रखते थे | बाजीराव को पता था कि मुगल साम्राज्य का पतन हो चूका है और इस स्थिति का फायदा उठाते हुए उसने उत्तरी भारत में अपना आक्रामक विस्तार किया |

मुगलों के पतन के बारे में बाजीराव कहता था कि “तने पर प्रहार करो और पत्तियों तो अपने आप गिर जायेगी ” | हालांकि नये पेशवा को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा था | उसके युवा अवस्था में पेशवा नियुक्त हो जाने से सारे वरिष्ठ मंत्री जैसे नारों राम मंत्री , आनन्द राम सोमंत और श्रीपत राय बाजीराव से इर्ष्या करते थे | दक्कन में मुगल सूबेदार निजाम-उल-मुल्क असफ़ जाह अपने क्षेत्र में अपना स्वतंत्र सम्राज्य स्थापित करना चाहता था और दक्कन में मराठा अधिकारों को कर लेने के लिए चुनौती देने लगा |

निजामो के खिलाफ अभियान

04 जनवरी 1721 को मराठा अधिकार के मामले पर सुलह करने के लिए बाजीराव , चिखलतन ने निजान आसफ जाह से मिला | हालांकि निजाम ने दक्कन प्रांत में कर वसूलने के मराठा अधिकार को मान्यता देने से इन्कार कर दिया | निजाम को 1722 में मुगल साम्राज्य में वजीर बनाया गया था लेकिन उसकी बढती शक्ति को देखते हुए बादशाह मुहम्मद शाह ने उसे 1723 में दक्कन भेज दिया था | निजामो ने उसके आदेश के खिलाफ विरोध किया और वजीर के पद से इस्तीफ़ा देकर दक्कन की तरफ कुच किया |

बादशाह मुहम्मद शाह ने अपनी सेना भेजी जिसमे मुगलों की पराजय हुयी | बदले में मुगल बादशाह को उसे दक्कन का सूबेदार बनाने के लिए विवश होना पड़ा | बाजीराव के नेतृत्व में मराठा , निजाम की मदद से इस जंग को जीत गये | बाजीराव को उसकी बहादुरी के लिए 7000 हाथियों की मनसबदारी से सम्मानित किया गया | युद्ध के बाद निजाम ने मराठा छत्रपति शाहू के साथ मुगल बादशाह दोनों को शांत रखा | वास्तव में वो सम्प्रभु साम्राज्य बनाना चाहता था और दक्कन में मराठो को अपना विद्रोही मानता था |

1725 में निजाम ने कर्नाटिक इलाके से मराठा राजस्व संग्राहक के मुद्दे को सुलझाने के लिए अपनी सेना भेजी | मराठो ने फतेह सिंह भोंसले के नेतृत्व में अपनी सेना भेजी जिसमे बाजीराव भी भोंसले के साथ लेकिन सेना को कमान नही दिया | मराठो को संधि के लिए बाध्य होना पड़ा | मानसून में उन्होंने दूसरा अभियान छेड़ा लेकिन इस बार भी वो निजाम को रोकने में असफल रहे |

इसी दौरान कोल्हापुर के संभाजी द्वितीय मराठा छत्रपति के पद के लिए विद्रोह पर उतर आये | निजाम ने मराठो की इस आपसी संघर्ष का फायदा उठाया | उसने कर देने से मना कर दिया क्योंकि उसे साफ़ नही हो रहा था कि असली छत्रपति साहू है या सम्भाजी | निजाम को इस मसले पर पंच बनाया गया | शाहू के दरबार में निजाम का प्रतिनिधि परशुराम पन्त प्रतिनिधि था जो बाजीराव का दुश्मन भी था | सम्भाजी द्वितीय के दरबार में उसका सहयोगी चन्द्रसेन यादव था जो एक दशक पहले बाजीराव के पिता के लिए लड़ा था |  बाजीराव ने शाहू को निजाम के मध्यस्ता की पेशकश लेने से इनकार करने को कहा और इसके बदले हमला करने को कहा |

Bajirao Mastani History in Hindi

27 अगस्त 1727 को बाजीराव ने निजाम के खिलाफ हमला बोल दिया | उसने धावा बोलते हुए निजाम के कई इलाको जलाना , बुरहानपुर और खानदेश को तबाह कर दिया | जब बाजीराव निजाम से दूर था तब निजाम ने पुणे पर धाव बोल दिया जहा सम्भाजी द्वीती छत्रपति बनकर बैठा था | 28 फरवरी 1728 को बाजीराव और निजाम की सेनाओ का पल्खेड की लड़ाई में आमना सामना हुआ | निजाम की हार हुयी और उसे संधि करनी पड़ी | इस संधि में शाहू को छत्रपति के साथ दक्कन से कर वसूलने के मराठा अधिकार को प्रस्तावित किया गया |

 1728 में बाजीराव ने अपने सैन्य अभियान का केंद्र ससवाद से पुणे कर दिया और इस दौरान उसने एक कस्बे को एक बड़े शहर में तब्दील कर दिया | बाजीराव ने मुथा नदी के किनारे शनिवारवाडा महला का भी निर्माण शूर कर दिया जो 1730 में पूरा हो गया , जहा से पेशवा पुरे राज्य पर नियन्त्रण रखते थे |

मालवा विजयी अभियान

1723 में बाजीराव ने मालवा के दक्षिणी इलाको पर अपने अभियान शुरू करने की योजना बनाई | मराठा मंत्री मालवा के कई इलाको से कर लेने में सफल रही थे | मराठा शक्ति का विरोध करने के लिए मुगल बादशाह ने गिरधर बहादुर को मालवा का शासक नियुक्त कर दिया | निजाम को हराने के बाद बाजीराव का ध्यान अब मालवा की तरफ था | अक्टूबर 1728 में बाजीराव अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा के नेतृव में एक विशाल सेना लेकर मालवा की ओर बढ़ा | चिमाजी की सेना ने अमझेरा की लड़ाई में मुगलों को शिकस्त दी | इस लड़ाई में गिरधर बहादुर और उसके सेनापति दया बहादुर को मार दिया गया | चिमाजी उज्जैन की तरफ भी बढ़ा लेकिन रसद की कमी के कारण उसे संधि करनी पड़ी | फरवरी 1729 तक मराठा सेना वर्तमान राजस्थान तक पहुच चुकी थी |

बुंदेलखंड अभियान

बुंदेलखंड में छत्रसाल ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह करते हुए अपना स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया | दिसम्बर 1728 में मुहम्मद खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने छत्रसाल को हराकर उसके परिवार को बंदी बना लिया | छत्रसाल लगातार बाजीराव से सहायता मांग रहा था लेकिन उस समय बाजीराव मालवा के अभियानों में व्यस्त था | मार्च 1729 में अंततः पेशवा परिवार ने छत्रसाल का जवाब दिया और बुंदेलखंड की ओर मराठा सेना ने कुच किया |

छत्रसाल भी अपनी कैद से निकलने में सफल रहा और मराठा सेना में शामिल हो गया | जैसे ही उनकी सेना में जैतपुर की तरफ रुख किया , बंगाश को बुंदेलखंड छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा | बुंदेलखंड में एक बार फिर छत्रसाल का शासन हो गया | छत्रसाल ने एक बड़ी जागीर बाजीराव को सौंपी और साथ ही अपनी बेटी मस्तानी का विवाह भी उससे करवाया | दिसम्बर 1731 में अपने मौत से पहले छत्रसाल ने कुछ इलाके मराठो को सौंप दिए |

गुजरात अभियान

मध्य भारत में मराठा शक्ति बढाने के बाद बाजीराव ने अपना अगला निशाना गुजरात को बनाया | 1730 में चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठा सेना को गुजरात भेजा गया | गुजरात में मुगल सूबेदार सरबुलंद खान ने मराठो के आगे समर्पण कर दिया और उनको गुजरात का कर वसूलने का अधिकार को मान्यता दे दी | बाजीराव की इस सफलता से छत्रपति शाहु के सेनापति त्रिम्ब्क राव नाराज हो गया क्योंकि इससे पहले त्रिमब्क राव वंश के लोगो ने अनेको बार गुजरात पर आक्रमण कर कर वसूलने का अधिकार लेना चाहा था लेकिन असफल रहे थे |

बाजीराव के नियन्त्रण से परेशान होकर दाभाडे ने पेशवा के खिलाफ विद्रोह कर दिया | गुजरात से दो अन्य मराठा मंत्री गायकवाड और कदम बंदे ने भी दाभाडे का पक्ष लिया | इस दौरान 1728 में गिरधर बहादुर को हराने के बाद मुगल बादशाह ने जय सिंह द्वितीय को मराठो को वश मर करने के नियुक्त किया | हालांकि जय सिंह ने मराठो के साथ शांतिपूर्ण समझौता किया | बादशाह इससे नाराज हो गया और उसने मुहम्मद खान बंगाश को उसके स्थान पर नियुक्त किया | बंगाश ने दाभाडे ,गायकवाड और कदम के साथ मिलकर संयुक्त सेना बनाई |

Bajirao Mastani History in Hindi

दाभोई की लड़ाई में त्रिंबक राव की मौत हो गयी | 13 अप्रैल को बाजीराव ने वरना की संधि के साथ सम्भाजी द्वितीय के साथ मतभेद सुलझा लिया जिसमे छत्रपति शाहू और सम्भाजी द्वितीय की सीमाए निर्धारित कर दी गयी | इसके बाद निजाम 27 दिसम्बर 1732 को बाजीराव से मिला और मराठा अभियानों में विघ्न नही डालने का वायदा किया | त्रिंबक राव को जीतने के बाद शाहू और बाजीराव ने शक्तिशाली दाभाडे वंश के साथ मुकाबला करने से दूर रहे | त्रिम्ब्क के बेटे यशवंत राव को शाहू का नया सेनापति घोषित किया गया | इसेक बाद बाजीराव की सेना ने दिल्ली का रुख किया और वहा फतेह पायी |

पेशवा बाजीराव का व्यक्तिगत जीवन

पेशवा बाजीराव  की पहली पत्नी का नाम काशीबाई था जिससे तीन पुत्र बालाजी बाजी राव (नाना साहेब), रघुनाथ राव और जनार्दन राव  | 1740 में बाजीराव की मृत्यु के बाद नाना साहेब , बालाजी बाजी राव के नाम से पेशवा के उत्तराधिकारी बने |

बाजीराव की दुसरी पत्नी महाराज छत्रसाल की बेटी मस्तानी थी | बाजीराव मस्तानी से बहुत गहरा प्यार करते थे इसलिए उनके लिए अपने निवास स्थान पुणे में एक महल भी बनवाया जिसे मस्तानी महल के नाम से जाना जाता है | उस दौर में हिन्दू ब्राह्मण समाज ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि मस्तानी का एक मुस्लिम भाई था | इसी वजह से भट परिवार को अपम्नानित भी होना पड़ा था | बाजीराव के भाई चिमनाजी अप्पा और माँ राधाबाई ने कभी मस्तानी को अपने परिवार का हिस्सा नही समझा | कई बार तो उन्होंने मस्तानी मी मौत की साजिश भी रची लेकिन छत्रपति साहू की मदद से मस्तानी बच गयी थी |

1734 में बाजीराव और मस्तानी के एक पुत्र हुआ जिसका जन्म के समय नाम कृष्णराव था | बाजीराव उसे ब्राह्मण बनना चाहते थे लेकिन माँ के मुस्लिम होने की वजह से पुजारियों ने हिन्दू उपनयन समारोह करने से मना कर दिया | इसी कारण उस बालक को मुस्लिम की बड़ा किया गया जो बाद में शमशेर बहादुर के नाम से जाना गया | काशीबाई ने छ साल के बच्चे को अपने संरक्षण में लिया और उसे अपने बच्चे की तरह पालन पोषण किया | 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठो और अफगानों के बीच हुयी लड़ाई में शमशेर बहादुर की केवल 27 वर्ष की उम्र में मौत हो गयी थी |

बाजीराव की मृत्यु

 28 अप्रैल 1740 को अचानक बीमार हो जाने या शायद दिल का दौरा पड़ने से 39 वर्ष की उम्र में बाजीराव की मृत्यु हो गयी | उस समय बाजीराव अपनी एक लाख सैनिको की सेना के साथ इंदौर शहर के निकट खारगोन जिले में अपने कैंप में थे | बाजीराव का नर्मदा नदी के तट पर रावरखेड़ी नामक स्थान पर दाह संस्कार किया गया और इसी स्थान पर उनकी याद में एक छतरी का निर्माण भी किया गया |

बाजीराव का जन्म ब्राह्मण परिवार में बालाजी विश्वनाथ के पुत्र के रूप में कोकणस्थ प्रान्त में हुआ था, जो छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे। २० वर्ष की आयु में उनके पिता की मृत्यु के पश्यात शाहू ने दुसरे अनुभवी और पुराने दावेदारों को छोड़कर बाजीराव को पेशवा के रूप में नियुक्त किया।

इस नियुक्ति से ये स्पष्ट हो गया था की शाहू को बाजीराव के बालपन में ही उनकी बुद्धिमत्ता का आभास हो गया था। इसलिए उन्होंने पेशवा पद के लिए बाजीराव की नियुक्ति की। बाजीराव सभी सिपाहीयो के बिच लोकप्रिय थे और आज भी उनका नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।

Bajirao Mastani Story in Hindi

बाजीराव, वह थे जिन्होंने 41 या उस से भी ज्यादा लड़ाईयां लड़ी थी, और एक भी ना हारने की वजह से विख्यात थे। जनरल मोंटगोमेरी, ब्रिटिश जनरल और बाद में फील्ड मार्शल ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लिखीत रूप में यह स्वीकार भी किया था।

अपने पिता के ही मार्ग पर चलकर, मुघल सम्राटो को समझकर उनकी कमजोरियों को खोजकर उन्हें तोड़ने वाले बाजीराव पहले व्यक्ति थे। सैयद बन्धुओ की शाही दरबार में घुसपैठी या दखल-अंदाजी बंद करवाना भी उनके आक्रमण का एक प्रभावी निर्णय था।

बाद में ग्वालियर के रानोजी शिंदे का साम्राज्य, इंदोर के होल्कर बारोदा के गायकवाड और धार के पवार इन सभी का निर्माण बाजीराव द्वारा मराठा साम्राज्य के खंड के रूप में किया गया, क्यूकी वे मुघल साम्राज्य से प्रतीशोध लेकर उनका विनाश कर के उनकी “जागीरदारी” बनाना चाहते थे।

उन्होंने अपना स्तंभ सासवड से और मराठा साम्राज्य की प्रशासनिक राजधानी/पूँजी को 1728 में सातारा से पुणे ले गये। इसी प्रक्रिया के दौरान, उन्होंने एक कसबे को शहर बनाने की भी नीव रखी। उनके प्रमुख, बापुजी श्रीपाट ने सातारा के कई धनवान परिवारों को पूना स्थापित होने के लिए मनाया, जो 18 पेठ में विभाजीत किया गया था।

1732 में महाराजा छत्रसाल की मृत्यु पश्यात, मराठा साम्राज्य मित्र साम्राज्य रूपी था, जबकि बाजीराव को छत्रसाल साम्राज्य का एक तिहाई भाग बुन्देलखण्ड में दिया गया।

एक उत्कृष्ट सेना का सेनापती होने की वजह से उनकी सेना और लोग उन्हें बहोत चाहते थे। वे कई बार हिंदु धर्म की रक्षा करने के लिए मुघलो से लड़े और उन्हें धुल भी चटाई, और हमेशा के लिए मुघलो को उत्तरी भारत पर ध्यान करने पूर्व ही मध्य और पश्चिमी भारत से दूर रखा। और इसी संकेत पर चलते हुए मराठाओ ने सिद्दी (मुघल नौसेनापति), मुघल, पुर्तगाल, निज़ाम, बंगाश इत्यादि को हराया।

देखा जाये तो शिवाजी महाराज के बाद बाजीराव ने ही मराठा साम्राज्य का सबसे बड़ा चित्र  निकाला था। ब्रिटिश पॉवर 19 वी सदी में स्थापित होने से पूर्व तक मराठा साम्राज्य प्रभावशाली रूप से 18 वी सदी तक चलता रहा।

 

मस्तानी का जीवन परिचय:-

 

Bajirao Mastani Love Story

मस्तानी पेशवा बाजीराव की दुसरी पत्नी थी, बाजीराव चौथे मराठा छत्रपति शाहूजी राजे भोसले के साम्राज्य में मराठाओ के सेनापति और प्रधान थे। ऐसा कहा जाता है की मस्तानी बहोत बहादुर और सुंदर महिला थी। मस्तानी बुंदेला के राजपूत नेता महाराजा छत्रसाल (1649-1731) की पुत्री थी, जो बुदेलखंड प्रान्त के संस्थापक थे | मस्तानी को जन्म उनकी, फारसी-मुस्लिम पत्नी रूह्यानिबाई ने दिया जो हैदराबाद के निज़ाम के दरबार में नर्तकी थी |

मस्तानी एक कुशल घुड़सवार थी, और साथ साथ भाला फेक और तलवारबाजी भी करती थी और एक बुद्धिमान नर्तकी एवम गायिका थी |  मस्तानी ने हमेशा सैन्य अभियान में बाजिराओ का साथ दिया | मस्तानी और बाजिराओ की पहली पत्नी काशीबाई ने बाजिराव को एक-एक पुत्र दिया परन्तु काशीबाई का पुत्र जल्दी ही मारा गया और मस्तानी का पुत्र था जिसका नाम शमशेर बहादुर था। 

कौन थीं मस्‍तानी

मस्‍तानी एक हिंदु महाराजा, महाराजा छत्रसाल बुंदेला की बेटी थीं।  उनकी मां रुहानी बाई हैदराबाद के निजाम के राज दरबार में नृत्‍यांगना थीं।  महराजा छत्रसाल ने बुंदलेखंड में पन्‍ना राज्‍य की स्‍थापना की थी।  कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मस्‍तानी को महाराजा छत्रसाल ने गोद लिया था।  मस्‍तानी की परवरिश मध्‍य प्रदेश के छतरपुर जिले से 15 किमी दूर मऊ साहनिया में हुई थी।  इस जगह पर मस्‍तानी के नाम पर एक मस्‍तानी महल भी बना हुआ है।  मस्‍तानी इसी महल में रहतीं और डांस करती थीं।  मस्‍तानी को राजनीति, युद्धकला, तलवारबाजी और घर के कामों का पूरा प्रशिक्षण मिला हुआ था।  मस्‍तानी के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही खूबसूरत थीं।  उन्‍हें अपनी मां की ही तरह नृत्‍य में कुशलता हासिल थी।  कहते हैं कि मस्‍तानी ने बाजीराव की मृत्‍यु के बाद जहर खाकर आत्‍महत्‍या कर ली थी।  कुछ लोग कहते हैं कि उन्‍होंने अपनी अंगूठी में मौजूद जहर को पी लिया था।  वहीं कुछ लोग मानते हैं कि वह बाजीराव की चिता में कूद कर सती हो गई थीं।  उनकी मौत सन 1740 में बताई जाती है। कैसे हुई बाजीराव से मुलाकात सन 1727-28 के दौरान महाराजा छत्रसाल के राज्‍य पर मुसलमान शासक मोहम्‍मद खान बंगश ने हमला बोल दिया था।  बताया जाता है कि खुद पर खतरा बढ़ता देख छत्रसाल ने बाजीराव को एक गुप्‍त संदेश भिजवाया।  इस संदेश में छत्रसाल ने बाजीराव से मदद की मांग की।  बाजीराव ने छत्रसाल की मदद की और मोहम्‍मद बंगश से उनका साम्राज्‍य बचा लिया।  छत्रसाल, बाजीराव की मदद से काफी खुश हुए और खुद को उनका कर्जदार समझने लगे।  इस कर्ज को उतारने के लिए छत्रसाल ने अपनी बेटी मस्‍तानी, बाजीराव को उपहार में दे दी थी।  बाजीराव पहली ही नजर में मस्‍तानी को दिल दे बैठे थे।  उन्‍होंने मस्‍तानी को अपनी दूसरी पत्‍नी बनाया।  मस्‍तानी से पहले उनका विवाह काशीबाई नामक महिला हो चुका था। मस्‍तानी के बारे में कुछ अनकही बातें कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मस्‍तानी हैदराबाद के निजाम की बेटी थीं।  महाराजा छत्रसाल ने निजाम को सन 1668 में एक युद्ध में हरा दिया था।  हार के बाद निजाम की पत्‍नी ने मस्‍तानी की शादी छत्रसाल के साथ करने की सलाह दी थी।  उनका मकसद था कि शादी से बुंदेलों के साथ निजामों के रिश्‍ते अच्‍छे हो सकेंगे।  इन रिश्‍तों की वजह से वह मध्‍य भारत पर अपना प्रभाव बढ़ा सकेंगे।  एक और कहानी के मुताबिक मस्‍तानी, छत्रसाल के दरबार में डांस करती थीं।  जब बाजीराव पेशवा ने उनका साम्राज्‍य बचाया तो दोस्‍ती के तौर पर मस्‍तानी को उन्‍होंने स्‍वीकार किया।  हालांकि लोग सिर्फ इस तथ्‍य को स्‍वीकार करते हैं मस्‍तानी महाराजा छत्रसाल की बेटी थीं।

ये भारत के मराठा इतिहास की सबसे दिलचस्प प्रेम कहानी है। मस्‍तानी एक हिंदु महाराजा, महाराजा छत्रसाल बुंदेला की बेटी थीं। उनकी मां रुहानी बाई हैदराबाद के निजाम के राज दरबार में नृत्‍यांगना थीं। महराजा छत्रसाल ने बुंदलेखंड में पन्‍ना राज्‍य की स्‍थापना की थी। ऐसे कई सारे प्रसंग मस्तानी के जीवन से जुड़े है, छत्रसाल के दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो, वो हैदराबाद के निज़ाम की कन्या थी। छत्रसाल ने निज़ाम को 1698 में पराजित किया था, और निजाम की पत्नी ने बुन्देल और उनके बिच अच्छे सम्बन्ध स्थापित होने हेतु उनकी बेटी से विवाह करने की सलाह दी क्यूकी उस समय मध्य भारत में छत्रसाल साम्राज्य सबसे सशक्त और शक्तिशाली साम्राज्य था।

मस्‍तानी एक हिंदु महाराजा, महाराजा छत्रसाल बुंदेला की बेटी थीं। उनकी मां रुहानी बाई हैदराबाद के निजाम के राज दरबार में नृत्‍यांगना थीं। महराजा छत्रसाल ने बुंदलेखंड में पन्‍ना राज्‍य की स्‍थापना की थी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मस्‍तानी को महाराजा छत्रसाल ने गोद लिया था। मस्‍तानी की परवरिश मध्‍य प्रदेश के छतरपुर जिले से 15 किमी दूर मऊ साहनिया में हुई थी। इस जगह पर मस्‍तानी के नाम पर एक मस्‍तानी महल भी बना हुआ है। मस्‍तानी इसी महल में रहतीं और डांस करती थीं। मस्‍तानी को राजनीति, युद्धकला, तलवारबाजी और घर के कामों का पूरा प्रशिक्षण मिला हुआ था। मस्‍तानी के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही खूबसूरत थीं। उन्‍हें अपनी मां की ही तरह नृत्‍य में कुशलता हासिल थी। मस्‍तानी इसी महल में रहतीं और डांस करती थीं। मस्‍तानी को राजनीति, युद्धकला, तलवारबाजी और घर के कामों का पूरा प्रशिक्षण मिला हुआ था। मस्‍तानी के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही खूबसूरत थीं। उन्‍हें अपनी मां की ही तरह नृत्‍य में कुशलता हासिल थी। कहते हैं कि मस्‍तानी ने बाजीराव की मृत्‍यु के बाद जहर खाकर आत्‍महत्‍या कर ली थी।

कैसे हुई थी बाजीराव और मस्तानी की मुलाकात:-

सन 1727-28 के दौरान महाराजा छत्रसाल के राज्‍य पर मुसलमान शासक मोहम्‍मद खान बंगश ने हमला बोल दिया था। बताया जाता है कि खुद पर खतरा बढ़ता देख छत्रसाल ने बाजीराव को एक गुप्‍त संदेश भिजवाया। इस संदेश में छत्रसाल ने बाजीराव से मदद की मांग की। बाजीराव ने छत्रसाल की मदद की और मोहम्‍मद बंगश से उनका साम्राज्‍य बचा लिया। छत्रसाल, बाजीराव की मदद से काफी खुश हुए और खुद को उनका कर्जदार समझने लगे। इस कर्ज को उतारने के लिए छत्रसाल ने अपनी बेटी मस्‍तानी, बाजीराव को उपहार में दे दी थी। बाजीराव पहली ही नजर में मस्‍तानी को दिल दे बैठे थे। उन्‍होंने मस्‍तानी को अपनी दूसरी पत्‍नी बनाया। मस्‍तानी से पहले उनका विवाह काशीबाई नामक महिला हो चुका था।

मस्तानी ने बाजीराव के दिल में एक विशेष स्थान बना लिया था। उसने अपने जीवन में हिंदू स्त्रियों के रीति रिवाजों को अपना लिया था। बाजीराव से संबंध के कारण मस्तानी को भी अनेक दुख झेलने पड़े पर बाजीराव के प्रति उसका प्रेम अटूट था। मस्तानी का सन 1734 में एक बेटा हुआ। उसका नाम शमशेर बहादुर रखा गया। बाजीराव ने कालपी और बांदा की सूबेदारी उसे दी, शमशेर बहादुर ने पेशवा परिवार की बड़े लगन और परिश्रम से सेवा की। सन 1761 में शमशेर बहादुर मराठों की ओर से लड़ते हुए पानीपत के मैदान में मारा गया था।

छत्रसाल की मदद के लिए बुंदेलखंड आए थे पेशवा, यहीं मिली थी मस्तानी:-

दिसंबर 1728 में मुग़ल सूबेदार मोहम्मद खान बंगश बुंदेलखंड पर हमला करने की फिराक में था। महाराजा छत्रसाल को यह पता था कि वे इस हमले का सामना नहीं कर सकते। इस वजह से छत्रसाल बहुत चिंतित थे और उन्होंने बाजीराव को एक भावुक पत्र लिखा। पत्र मिलते ही बाजीराव अपने मराठा दस्ते के साथ बुंदेलखंड पहुंच गए। छत्रसाल की सेना के साथ मिलकर बाजीराव की फ़ौज ने मोहम्मद शाह को मुंहतोड़ जवाब दिया। लड़ाई में बंगश की हार हुई। उस वक्त बंगश के बेटे कायम खान ने एक बड़ी फौज के सहारे पिता की मदद करनी चाही, लेकिन मराठा-बुंदेली सेना के जोरदार हमलों के आगे उसे भी हार का सामना करना पड़ा। इस लड़ाई में बंगश गिरफ्तार किया गया। उसे इस वादे पर छोड़ा गया कि वह फिर कभी बुंदेलखंड पर हमला नहीं करेगा।

मौके पर मिले इस मदद से छत्रसाल, बाजीराव के आभारी हो गए थे। उन्होंने बाजीराव को अपना तीसरा बेटा स्वीकार किया। इतना ही नहीं छत्रसाल ने अपने राज्य के तीन टुकड़े कर एक हिस्सा बाजीराव को सौंप दिया। इसमें झांसी, कालपी, सिरोंज, सागर और हिरदेनगर शामिल था। राज्य देने के अलावा महाराजा ने अपनी बेटी मस्तानी का हाथ भी बाजीराव को दे दिया। कुछ लोगों का मानना है कि मस्तानी कोई और नहीं बल्कि छत्रसाल के दरबार की एक ‘राजनर्तकी’ थी।

कई इतिहासकारों का मानना है कि राजा छत्रसाल ने अपनी लाड़ली बेटी मस्तानी की शादी बकायदा शाही रीति-रिवाज के साथ की थी.
बताया जाता है कि मस्तानी का असली नाम कंचनी था और वो बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की बेटी थी. अपनी इस लाड़ली बेटी की शादी में महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को दहेज में दो हीरों की खदानें, 32 लाख की सोने की मोहरें और सोने-चांदी के कई गहने दिए थे.
जानकारों का मानना है कि अगर इस युग के हिसाब से दहेज की कीमत का अंदाजा लगाया जाए तो उसकी कीमत करीब 50 हजार करोड़ होगी.
मस्तानी को कई विधाओं में महारत हासिल थी. जिनमें से वो नृत्य में तो बेमिसाल थी ही, साथ ही तलवारबाजी, तीरंदाजी और घुड़सवारी में भी पूरी तरह निपुण थीं.
इतिहास बताता है कि मस्तानी को भले ही उस समय के पंडितों ने स्वीकार नहीं किया, लेकिन वो हिन्दू मुस्लिम संस्कृति के नायाब मेल का प्रतीक थीं. वो कृष्ण की भक्त थीं और नमाज भी पढ़ती थीं. पूजा भी करती थीं और रोजा भी रखती थीं

मस्तानी और बाजीराव का पुत्र:-

 मस्तानी से बाजीराव को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई। माना जाता है कि स्थानीय ब्राह्मण समुदाय एवं हिन्दुओं ने मस्तानी के पुत्र को पूर्ण रूप से ब्राह्मण मानने से इन्कार कर दिया, क्योंकि मस्तानी मुसलमान थी। यहां तक कि उन्होंने बाजीराव और मस्तानी की शादी को भी मानने से इन्कार कर दिया।

काशीबाई:-

बाजीराव की पहली पत्नी का नाम काशीबाई था। बाजीराव से विवाह के बाद, काशीबाई मराठा साम्राज्य की रानी बन गई। काशीबाई बाजीराव के प्रति बेहद ही निष्ठावान थीं। जब बाजीराव का विवाह मस्तानी से हुआ, काशीबाई ने इस शादी को स्वीकार किया, क्योंकि उस समय राजा का किसी दूसरी स्त्री से विवाह गलत नहीं माना जाता था।

कुछ समय बाद काशीबाई और मस्तानी ने अपने-अपने पुत्रों को जन्म दिया, लेकिन काशीबाई के पुत्र की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई। जहां एक तरफ काशीबाई अपने पुत्र को खोने के दुःख से उबर रही थी, वहीं दूसरी ओर मस्तानी का दबदबा बढ़ता ही जा रहा था। इस बात से काशीबाई व्यथित थी। इतिहासकार मानते हैं कि काशीबाई को मस्तानी के पुत्र को देखकर ईर्ष्या होती थी |

प्रेमपंथ के विषय में कांटें:-

 1739 ई० के आरंभ में पेशवा बाजीराव और मस्तानी का संबंध विच्छेद कराने के असफल प्रयत्न किए गए। 1739 ई० के अंतिम दिनों में बाजीराव को आवश्यक कार्य से पूना छोड़ना पड़ा। मस्तानी पेशवा के साथ न जा सकी। चिमाजी अप्पा और नाना साहब ने मस्तानी के प्रति कठोर योजना बनाई। उन्होंने मस्तानी को पर्वती बाग में (पूना में) कैद किया। बाजीराव को जब यह समाचार मिला, वे अत्यंत दु:खित हुए। वे बीमार पड़ गए। इसी बीच अवसर पा मस्तानी कैद से बचकर बाजीराव के पास 4 नवम्बर 1739 ई० को पटास पहुँची। बाजीराव निश्चिंत हुए, पर यह स्थिति अधिक दिनों तक न रह सकी। शीघ्र ही पुरंदरे, काका मोरशेट तथा अन्य व्यक्ति पटास पहुँचे। उनके साथ पेशवा बाजीराव की माँ राधाबाई और उनकी पत्नी काशीबाई भी वहाँ पहुँची। उन्होंने मस्तानी को समझा बुझाकर लाना आवश्यक समझा। मस्तानी पूना लौटी। कट्टरपंथी लोग मस्तानी को मार ही डालना चाहते थे, क्योंकि उनके अनुसार सभी झंझटों का मूल वही थी। उन लोगों ने छत्रपति से आज्ञा भी लेने का प्रयत्न किया, परंतु छत्रपति राजा शाहू अधिक बुद्धिमान थे।

Bajirao Mastani History in Hindi

1740 ई० के आरंभ में बाजीराव नासिरजंग से लड़ने के लिए निकल पड़े और गोदावरी नदी को पारकर औरंगाबाद के पास शत्रु को बुरी स्थिति में ला दिया। 27 फरवरी 1740 ई० को मुंगी शेगाँव में दोनों के बीच संधि हो गयी। बाजीराव के जीवन का यह अंतिम अभियान सिद्ध हुआ। उस समय कोई नहीं जानता था कि बाजीराव की मृत्यु सन्निकट है। 7 मार्च 1740 ईस्वी को नानासाहेब के नाम चिमना जी के पत्र से संदेह होता है कि बाजीराव हृदय से रुग्ण थे। चिमना जी ने इस पत्र में लिखा था कि जब से हम एक दूसरे से विदा हुए हैं, मुझको पूजनीय राव से कोई समाचार प्राप्त नहीं हुआ है। मैंने उसके विक्षिप्त मन को यथाशक्ति शांत करने का प्रयास किया, परंतु मालूम होता है कि ईश्वर की इच्छा कुछ और ही है। मैं नहीं जानता हूं कि हमारा क्या होने वाला है। मेरे पुणे वापस होते ही हम को चाहिए कि हम उसको (मस्तानी को) उसके पास भेज दें | स्पष्ट है कि बाजीराव अत्यंत व्याकुल था। मस्तानी के विरह तथा उसे मुक्त कराने में अपनी अक्षमता से उसे मानसिक क्लेश और क्षोभ था।  28 अप्रैल 1740 ईस्वी को अपनी पहली और अंतिम बीमारी से उसकी मृत्यु हुई। इस समय बाजीराव की आयु केवल 42 वर्ष की थी। उसकी मृत्यु के समय उसके पास उसकी क्षमाशील पत्नी काशीबाई भी थी।

बाजीराव के परिवार के मस्तानी के साथ दुर्व्यहार के कारण बाद में बाजीराव ने मस्तानी के लिए 1734 में कोथरुड में एक अलग निवास स्थान बनाया, जो शनिवार वाडा से कुछ ही दुरी पर था। यह स्थान आज भी कर्वे रोड पर “मृत्युंजय मंदिर” के नाम से जाना जाता है। जहा कोथरुड के महल के टुकड़े टुकड़े कर दिए गये थे वो आज भी राजा केलकर संग्रहालय के विशेष विभाग में देखा जा सकता है। परन्तु इस सम्बन्ध में मस्तानी से जुड़े कोई सरकारी कागज़ बाजीराव के साम्राज्य में दिखाई नहीं देते।

बाजीराव की म्रत्यु:-

28 अप्रैल 1740 में जब बाजीराव अपने खरगांव की जमीन का निरिक्षण कर रहे थे तब आकस्मिक बुखार के वजह से उनकी मृत्यु 39 वर्ष की आयु में हुई | तब काशीबाई, चिमाजी अप्पा, बालाजी (नानासाहेब) और मस्तानी भी खरगांव आये थे | जहा 28 अप्रैल 1740 को नर्मदा नदी के किनारे रावेर खेड में उनके शरीर को अग्नि दी गयी| और इसके कुछ समय बाद ही पुणे के समीप पबल गाव में मस्तानी की मृत्यु हो गयी।

उनके लिए दिल्ली में 100000 सैन्य का रास्ता भी बनाया गया जिसका शिवीर खरगोन जिले में इंदोर के पास बना हुआ है | उनकी याद में एक शिव मंदिर भी बनाया गया जो उसी के निकट स्थित है।

मस्तानी की म्रत्यु:-

पौराणिक कथाओ के अनुसार, बाजीराव के मृत्यु की खबर सुनते ही मस्तानी ने अपनी अंगूठी का ज़हर पीकर आत्महत्या कर ली थी। वही दुसरो का ऐसा मानना है की उसके पति के दाह संस्कार के वक़्त उसने बाजीराव की चिता पर छलांग लगाई थी। परन्तु इस प्रकार का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जो मस्तानी की मृत्यु का असली कारण बता सके। परन्तु यह अक्सर कहा जाता है की बाजीराव की 1740 में मृत्यु के पच्छात मस्तानी ज्यादा दिन तक नहीं जीवित रही।

मध्य प्रदेश में इंदौर शहर के पास पेशवा बाजीराव की समाधि है, जो करीब तीन सौ साल पहले उनकी मौत के बाद बनाई गई थी और बाजीराव की इस समाधि से करीब 600 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के पुणे में मस्तानी की कब्र है। वो मस्तानी जिसकी मोहब्बत में बाजीराव ने धर्म का फासला भी खत्म कर दिया। खास बात ये है कि बाजीराव और मस्तानी की ये समाधियां ही उनकी उस बेमिसाल मोहब्बत की गवाह भी है जिसकी कहानियां मुंह जुबानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है।

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  1. Very very nice i love indian king nd queen

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