Harivansh Rai Bachchan Ki Kavitayen

Harivansh Rai Bachchan Ki Kavitayen

Harivansh Rai Bachchan Ki Kavitayen ab hindi me. Yaha par unki kuch rachnaye di hui hai.

**** हरिबंश राय बच्चन जी की “अग्निपथ” कबिता ****

Harivansh Rai Bachchan Ki rachna agnipath

 

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ !

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ !

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ !!

– हरिवंश राय बच्चन 

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**** हरिबंश राय बच्चन जी की “रोक न पाया मैं आँसू “- कबिता ****

Harivansh Rai Bachchan Ki Kavitayen hindi me

जिसके पीछे पागल हो कर, मैं दौड़ा अपने जीवन भर,
जब मृगजल में परिवर्तित हो, मुझ पर मेरा अरमान हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू… !!

जिसमें अपने प्राणों को भर, कर देना चाहा अजर–अमर,
जब विस्मृति के पीछे छिपकर, मुझ पर वह मेरा गान हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू… !!

मेरे पूजन आराधन को, मेरे संपूर्ण समर्पण को,
जब मेरी कमज़ोरी कहकर, मुझ पर मेरा पाषाण हँसा!
तब रोक न पाया मैं आँसू… !!

– हरिवंश राय बच्चन

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**** हरिबंश राय बच्चन जी की “मैं कल रात नहीं रोया था” – कबिता ****

 

मैं कल रात नहीं रोया था,
दुख सब जीवन के विस्मृत कर,
तेरे वक्षस्थल पर सिर धर,
तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था,
मैं कल रात नहीं रोया था..!

प्यार-भरे उपवन में घूमा,
फल खाए, फूलों को चूमा,
कल दुर्दिन का भार न अपने पंखो पर मैंने ढोया था,
मैं कल रात नहीं रोया था..!

आँसू के दाने बरसाकर,
किन आँखो ने तेरे उर पर,
ऐसे सपनों के मधुवन का मधुमय बीज, बता, बोया था?
मैं कल रात नहीं रोया था..!!

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**** हरिबंश राय बच्चन जी की “क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं” – कबिता ****

 

अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं..!

याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं..!

दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं,
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं..!!

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Madhushala Poem in Hindi by Harivansh Rai Bachchan

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