Kabir Das Poems In Hindi

Kabir Das Poems in Hindi

Kabir Das Poems in HindiKabir was an Indian mystic poet and saint of 15th-century. A mystical poet and great Saint of India, was born in the year 1440 and died in the year 1518. Whose writings influenced Hinduism’s Bhakti movement and his verses are found in Sikhism’s scripture Guru Granth Sahib. He was strongly influenced by his teacher, the Hindu bhakti leader but His early life was in a Muslim family.  Kabīr was a mystic poet and saint of India, and whose writings have greatly influenced the Bhakti movement. The name Kabir comes from Arabic al-Kabīr. Home Slideshows Kabir Ke Dohe 15 Famous Sayings from the Mystic-poet Kabir, or Sant Kabir as he was known, has inspired generations of people with his now popular sayings. His poetry was so full of spiritual insight that he ceased to be a mere poet and won the title “Sant”. The meaning of the Kabir is The Great according to the Islam. Kabir Panth is the huge religious community which identifies the Kabir as the originator of the Sant Mat sects. Kabir ranks among the world’s greatest poets. He is perhaps the most quoted author, with the exception of Tulsidas in India. Kabir has criticized perhaps all existing sects in India, still he is mentioned with respect by even orthodox authors. Vaishnav author Nabhadas in his Bhakta-Mal writes.

Sant Kabir Das Ke Dohe

(1)

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात,
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात..!!

अर्थ: कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।

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(2)

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास,
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास..!!

अर्थ: यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।

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(3)

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं,
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं..!!

अर्थ: इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

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(4)

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद,
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद..!!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

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(5)

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस,
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस..!!

अर्थ: कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न  मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।

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(6)

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत,
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत..!!

अर्थ: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

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(7)

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ,
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ..!!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।

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(8)

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई,
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ..!!

अर्थ: शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।

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(9)

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय,
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय..!!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

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(10)

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर,
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर..!!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

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Kabir Das Poems in Hindi

(11)

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई,
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई..!!

अर्थ: मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।

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(12)

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही,
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही..!!

अर्थ: जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया  – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।

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(13)

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी,
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी..!!

 अर्थ: कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?
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(14)

आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत,
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत..!!

अर्थ: देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।

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(15)

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय,
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय..!!

अर्थ: रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी –

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(16)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय..!!

अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

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(17)

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय..!!

(18)

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय..!!

अर्थ: इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

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(19)

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय..!!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।

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(20)

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय..!!

अर्थ: मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा ।

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Kabir Das Poems in Hindi

(21)

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर..!!

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो।

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(22)

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान..!!

अर्थ: सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

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(23)

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत..!!

अर्थ: यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

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(24)

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ..!!

अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

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(25)

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि..!!

 अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

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(26)

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप..!!

अर्थ: न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

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(27)

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ..!!

अर्थ: जीवन में जो लोग हमेशा प्रयास करते हैं वो उन्हें जो चाहे वो पा लेते हैं जैसे कोई गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ न कुछ पा ही लेता हैं। लेकिन कुछ लोग गहरे पानी में डूबने के डर से यानी असफल होने के डर से कुछ करते ही नहीं और किनारे पर ही बैठे रहते हैं।

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(28)

कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह,

देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह..!!

अर्थ – जब तक यह देह है तब तक तू कुछ न कुछ देता रह। जब देह धूल में मिल जायगी, तब कौन कहेगा कि ‘दो’।

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(29)

देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह,

निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह..!!

अर्थ – मरने के पश्चात् तुमसे कौन देने को कहेगा ? अतः निश्चित पूर्वक परोपकार करो, यही जीवन का फल है।

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(30)

या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत,

गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत..!!

अर्थ – इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो। सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं।

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Kabir Das Poems in Hindi

(31)

ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय,

औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय..!!

अर्थ – मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो।

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(32)

गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह,

आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह..!!

अर्थ – जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो।

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(33)

धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर,

अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर..!!

अर्थ – धर्म (परोपकार, दान सेवा) करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो।

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(34)

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय,

साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय..!!

अर्थ – उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट (दुष्टों)तथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।

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(35)

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत,

साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत..!!

अर्थ – – गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’।

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(36)

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय,

जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय..!!

अर्थ – ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।

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(37)

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव,

स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव..!!

अर्थ – अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान पर भी मत जाओ। क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे।

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(38)

इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति,

कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति..!!

अर्थ – उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहाँ पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए।

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(39)

कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर,

इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर..!!

अर्थ – सन्तों के साधी विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल जब परिपूर्ण रूप से ह्रदय में आया। तब सन्तों ने इद्रियों को रोककर शरीर की व्याधियों को धूल कर दिया। अर्थात् तन-मन को वश में कर लिया।

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(40)

गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै। कोटी सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परे।

कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै। गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै..!!

अर्थ – यदि अपने ह्रदय में थोड़ी भी सहन शक्ति हो, ओ मिली हुई गली भारी ज्ञान है। सहन करने से करोड़ों काम (संसार में) सुधर जाते हैं। और शत्रु आकर पैरों में पड़ता है। यदि ज्ञान ह्रदय में आ जाय, तो मिली हुई गाली से अपनी क्या हानि है ?

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Kabir Das Poems in Hindi

(41)

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच,

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच..!!

अर्थ – गाली से झगड़ा सन्ताप एवं मरने मारने तक की बात आ जाती है। इससे अपनी हार मानकर जो विरक्त हो चलता है, वह सन्त है, और (गाली गलौच एवं झगड़े में) जो व्यक्ति मरता है, वह नीच है।

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(42)

बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर,

कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और..!!

अर्थ – बहते हुए को मत बहने दो, हाथ पकड़ कर उसको मानवता की भूमिका पर निकाल लो। यदि वह कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो वचन और सुना दो।

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(43)

बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार,

औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार..!!

अर्थ  हे दास ! तू सद्गुरु की सेवा कर, तब स्वरूप-साक्षात्कार हो सकता है। इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर फिर से बारम्बार न मिलेगा।

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(44)

बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच,

बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच..!!

अर्थ – हे नीच मनुष्य ! सुन, मैं बारम्बार तेरे से कहता हूं। जैसे व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मार जाता है। वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा।

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(45)

मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय,

है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय..!!

अर्थ – मन-राजा बड़ा भारी व्यापारी बना और विषयों का टांडा (बहुत सौदा) जाकर लाद लिया। भोगों-एश्वर्यों में लाभ है-लोग कह रहे हैं, परन्तु इसमें पड़कर मानवता की पूँजी भी विनष्ट हो जाती है।

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(46)

बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश,

खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश..!!

अर्थ – सौदागरों के बैल जैसे पीठ पर शक्कर लाद कर भी भूसा खाते हुए चारों और फेरि करते है। इस प्रकार इस प्रकार यथार्थ सद्गुरु के उपदेश बिना ज्ञान कहते हुए भी विषय – प्रपंचो में उलझे हुए मनुष्य नष्ट होते है।

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(47)

जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश,

तन – मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश..!!

अर्थ – शरीर रहते हुए तो कोई यथार्थ ज्ञान की बात समझता नहीं, और मार जाने पर इन्हे कौन उपदेश करने जायगा। जिसे अपने तन मन की की ही सुधि – बूधी नहीं हैं, उसको क्या उपदेश किया?

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(48)

जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर,

जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर..!!

अर्थ – जिस भ्रम तथा मोह की रस्सी से जगत के जीव बंधे है। हे कल्याण इच्छुक ! तू उसमें मत बंध। नमक के बिना जैसे आटा फीका हो जाता है। वैसे सोने के समान तुम्हारा उत्तम नर – शरीर भजन बिना व्यर्थ जा रहा हैं।

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(49)

बुरा जो देखन मैं देखन चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय..!!

अर्थ – जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। पर फिर जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि दुनिया में मुझसे बुरा और कोई नहीं हैं।

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(50)

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय..!!

अर्थ – संत कबीरदासजी कहते हैं की बड़ी बड़ी क़िताबे पढ़कर कितने लोग दुनिया से चले गये  लेकिन सभी विद्वान नहीं बन सके। कबीरजी का यह मानना हैं की कोई भी व्यक्ति प्यार को अच्छी तरह समझ ले तो वही दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानी होता हैं।

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(51)

साधू ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय,

सार – सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय..!!

अर्थ – जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता हैं वैसे इस दुनिया में सज्जनों की जरुरत हैं जो सार्थक चीजों को बचा ले और निरर्थक को चीजों को निकाल दे।

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(52)

तिनका कबहूँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहूँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय..!!

अर्थ – अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं।

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(53)

धीरे – धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय..!!

अर्थ – जैसे कोई आम के पेड़ को रोज बहोत सारा पानी डाले और उसके नीचे आम आने की रह में बैठा रहे तो भी आम ऋतु में ही आयेंगे, वैसेही धीरज रखने से सब काम हो जाते हैं।

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(54)

माला फेरत जग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर..!!

अर्थ – जब कोई व्यक्ति काफ़ी समय तक हाथ में मोती की माला लेकर घुमाता हैं लेकिन उसका भाव नहीं बदलता। संत कबीरदास ऐसे इन्सान को एक सलाह देते हैं की हाथ में मोतियों की माला को फेरना छोड़कर मन के मोती को बदलो।

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(55)

जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान..!!

अर्थ – सज्जन और ज्ञानी की जाति पूछने अच्छा हैं की उसके ज्ञान को समझना चाहिए। जैसे तलवार का किमत होती हैं ना की उसे ढकने वाले खोल की।

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(56)

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत..!!

अर्थ – संत कबीरदासजी अपने दोहे में कहते हैं की मनुष्य का यह स्वभाव होता है की वो दुसरे के दोष देखकर और ख़ुश होकर हंसता है। तब उसे अपने अंदर के दोष दिखाई नहीं देते. जिनकी न ही शुरुवात हैं न ही अंत।

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