Laila – Majnu story in Hindi Language

Laila – Majnu story in Hindi Language

Laila – Majnu story in the Hindi Language is a great love story. Love is a delirious passion! And nowhere is it better witnessed than in the tragic tale of Laila and Majnu. Read the full story of Laila and Majnu. Laila-Majnu is the name that is taken whenever there is talk about love or faith”. The A son was born to Shah Amri an Arab chieftain. The boy named Qasis. Now the region is aflame with their love story, Kaish, who is now known as Majnu, cannot get Laila out of his mind and roams around the desert semi-senile, Here is the story of Laila Manju. What I am teaching is not a religion but a religiousness. Read a full heart touching love story of Laila and Majnu.

लैला मजनू का इतिहास

 

लैला-मजनू का नाम तो हर कोई जानता है. जब भी प्यार का नाम लिया जाता है, इनका ज़िक्र हो ही जाता है. जब जालिम दुनिया ने इनकी मोहब्बत से नफ़रत करने की ठानी, तो इन्होंने हर कीमत पर एक-दूसरे के साथ रहने की ज़िद कर ली. फिर अंजाम जो हुआ, उसे दुनिया जानती है. कहते हैं कि वे दोनों मोहब्बत के लिए क़ुर्बान हो गए और दुनिया से दूर आसमान में कहीं मिले. आज सैकड़ों सालों के बाद भी लैला-मजनू की प्रेम कहानी अमर है.

यह उस दौर की कहानी है, जब प्रेम एक गुनाह था. अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस (मजनू) और लैला नाम की लड़की के बीच मरते दम तक प्यार चला और आखिर इसका अंत दुखद हुआ. उनके अमर प्रेम के चलते ही लोगों ने दोनों के नाम के बीच में ‘और’ लगाना मुनासिब नहीं समझा और दोनों हमेशा के लिए ‘लैला-मजनू’ के रूप में ही अमर हो गए.

लैला और मजनूं एक प्रेम कहानी है जिसकी उत्पत्ति 11 वी शताब्दी में सेंचुरी अरबिया  में हुई थी, बाद में उसे पर्शियन कवी निजामी गंजवी ने अपना लिया था जिन्होंने “खोसरो और शिरीन”  भी लिखी थी। पाँच सबसे लम्बी कथा कविताओ यह तीसरी थी।

लैला और मजनूं को भारतीय रोमियो जूलियट कहा जाता है। प्रेमी जोड़ों को भी यहां लैला मजनूं के नाम से पुकारा जाता है। एक दूसरे के प्रेम में आकंठ डूबे लैला मजनूं ने प्रेम में विफल होने के बाद अपनी जान दे दी थी। जमाने की रुसवाईयों के बावजूद सुनने में थोड़ा अजीब लगता है कि दोनो की मज़ारें बिल्कुल पास पास हैं। राजस्थान के गंगानगर जिले में अनूपगढ से 11 किमी की दूरी पर स्थित यह मज़ार लोगों को प्रेम का अमर किस्सा बयान करती प्रतीत होती है। ख़ास बात यह है कि भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के नजदीक स्थित यह मज़ार हिन्दू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान के भेद से बहुत ऊपर उठ चुकी है। यहां हिंदू भी आकर सर झुकाते हैं और मुस्लिम भी। भारतीय भी आते हैं और पाकिस्तानी भी। सार यह है कि प्रेम धर्म और देशों की सीमाओं से सदा सर्वदा मुक्त रहा है। आज़ादी से पूर्व भारत और पाकिस्तान एक ही थे। यह देश मुस्लिम देशों की सीमाओं से लगा हुआ था। विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान दो देश बन गए और इन दोनों देशों को परस्पर दुश्मन के तौर पर देखा गया। राजस्थान पंजाब और कश्मीर की सीमाएं पाकिस्तान से लगती हैं और समय समय पर सीमा पर तनाव की खबरें भी आती हैं। लेकिन दुश्मनी की इसी सीमा पर राजस्थान में एक स्थान ऐसा भी है जहां नफरत के कोई मायने नहीं हैं। जहां सीमाएं कोई अहमियत नहीं रखती है। यह स्थान राजस्थान के गंगानगर ज़िले की अनूपगढ तहसील के क़रीब है, जहां लैला मजनूं की मज़ारें प्रेम का संदेश हवाओं में महकाती हैं। अनूपगढ के बिजनौर में स्थित ये मज़ारें पाकिस्तान की सीमा से महज 2 किमी अंदर भारत में हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अपने प्रेम को बचाने समाज से भागे इस प्रेमी जोड़े ने राजस्थान के इसी बिजनौर गांव में शरण ली और यहीं अंतिम सांस भी ली। इस स्थल को मुस्लिम लैला मजनूं की मज़ार कहते हैं और हिंदू इसको लैला मजनूं की समाधि कहते हैं।

निजामी के बहुत समय पहले, किंवदंती अपने वास्तविक रूप में इरानिनन अख़बार में थी। मजनूं के बारे में वास्तविक जानकारी बहुत कम है। निजामी के कार्य में बहुत सी नकली बाते सामने आ रही थी, उनके कार्यो के बाद बहुत सी वास्तविक बातो को उजागर किया गया था।

अरब के प्रेमी युगल लैला-मजनूँ सदियों से प्रेमियों के आदर्श रहे हैं और रहें भी क्यों नहीं, इन्होंने अपने अमर प्रेम से दुनिया को दिखा दिया है कि मोहब्बत इस जमीन पर तो क्या जन्नत में भी जिंदा रहती है। अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस की किस्मत में यह प्रेमरोग हाथ की लकीरों में ही लिखा था। उसे देखते ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि कैस प्रेम दीवाना होकर दर-दर भटकता फिरेगा। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी को झुठलाने के लिए शाह अमारी ने खूब मन्नतें कीं कि उनका बेटा इस प्रेमरोग से महरूम रहे, लेकिन कुदरत अपना खेल दिखाती ही है।

 दमिश्क के मदरसे में जब उसने नाज्द के शाह की बेटी लैला को देखा तो पहली नजर में उसका आशिक हो गया। मौलवी ने उसे समझाया कि वह प्रेम की बातें भूल जाए और पढ़ाई में अपना ध्यान लगाए, लेकिन प्रेम दीवाने ऐसी बातें कहाँ सुनते हैं।कायस इब्न अल-मुलाव्वाह लैला के प्यार में पड़ गया था। जल्द ही उसने अपने और लैला के प्यार पर कविताए बनाना शुरू कर दी, कविताओ में वह लैला के नाम का जिक्र भी किया करता था। लैला को मनाने के लिए उसके द्वारा की जा रही कोशिशो को देखते हुए स्थानिक लोगो ने उसे मजनूं का नाम दिया था।  कैस की मोहब्बत का असर लैला पर भी हुआ और दोनों ही प्रेम सागर में डूब गए। नतीजा यह हुआ कि लैला को घर में कैद कर दिया गया और लैला की जुदाई में कैस दीवानों की तरह मारा-मारा फिरने लगा। उसकी दीवानगी देखकर लोगों ने उसे ‘मजनूँ’ का नाम दिया। आज भी लोग उसे मजनू के नाम से जानते हैं और मजनू मोहब्बत का पर्याय बन गया है।
लैला-मजनूँ को अलग करने की लाख कोशिशें की गईं लेकिन सब बेकार साबित हुईं।और जब मजनूं ने लैला के पिता से शादी का हाथ माँगा तो लैला के पिता ने इंकार कर दिया था, उन्होंने ऐसा कहकर इंकार कर दिया की लैला किसी पागल इंसान से शादी नही करेंगी। इसके बाद लैला की शादी किसी अमीर व्यापारी से करवा दी गयी। जब मजनूं ने लैला की शादी के बारे में सुना तो वह आदिवासी इलाके से भाग गया और आस-पास के रेगिस्तान में आवारागर्दी करने लगा। उनके परिवार ने उसके वापिस आने की आशा भी छोड़ दी थी और वे जंगल में उसके लिए खाना छोड़ चले जाते थे। कयी बार मजनूं लैला के प्यार में मिटटी पर लकड़ी की सहायता से लैला पर आधारित कविताए भी लिखता था। जिससे उनकी शादी हुई वह इंसान भी काफी अच्छा और खुबसूरत भी था, उसका नाम वरद अल्थाक़फ़ी  था। लैला को भी शादी के बाद अपने शौहर के साथ उत्तरी अरबिया में भेज दिया गया था। कुछ कथाओ के अनुसार लैला की मृत्यु अपने मजनूं को देखे बिना ही ह्रदय विकार की वजह से हुई थी। लेकिन मजनूं को इस बात का पता 688 AD में लगा था। इसके बाद मजनूं ने लैला की कब्र के पास पत्थरो पर तीन कविताए लिखी, जो लैला के लिए मजनूं द्वारा लिखी गयी अंतीम कविताए थी।

उनकी मृत्यु से पहले उनके प्यार में और भी बहुत सी रोमांचक बाते हुई थी। मजनूं द्वारा लिखी गयी कविताओ में निचे की कविता भी शामिल है –

“Laila Majnu love story in Hindi”

“मै इन दीवारों से गुजरता जाऊंगा, जिनसे लैला गुजरती है

और मै उस दीवार को किस (चूमना) करूंगा जिससे लैला गुजरती है

यह मेरे दिल में दीवारों के प्रति प्यार नही है जो मेरे दिल को खुश करता है

लेकिन जो उन दीवारों के पास से चलकर मेरा ध्यान आकर्षित करती है, उससे मुझे प्यार है।”

लेकिन उसने अपने शौहर को बता दिया कि वह सिर्फ मजनूँ की है। मजनूँ के अलावा उसे और कोई नहीं छू सकता। वरद अल्थाक़फ़ी ने उसे तलाक दे दिया और मजनूँ के प्यार में पागल लैला जंगलों में मजनूँ-मजनूँ पुकारने लगी। जब मजनूँ उसे मिला तो दोनों प्रेमपाश में बँध गए। लैला की माँ ने उसे अलग किया और घर ले गई। मजनूँ के गम में लैला ने दम तोड़ दिया। लैला की मौत की खबर सुनकर मजनूँ भी चल बसा।
उनकी मौत के बाद दुनिया ने जाना कि दोनों की मोहब्बत कितनी अजीज थी। दोनों को साथ-साथ दफनाया गया ताकि इस दुनिया में न मिलने वाले लैला-मजनूँ जन्नत में जाकर मिल जाएँ। लैला-मजनूँ की कब्र आज भी दुनियाभर के प्रेमियों की इबादतगाह है। समय की गति ने उनकी कब्र को नष्ट कर दिया है, लेकिन लैला-मजनूँ की मोहब्बत जिंदा है और जब तक दुनिया है जिंदा रहेगी।

कहा जाता है कि दोनों ने अपनी ज़िंदगी के आखिरी लम्हे पाकिस्तान बॉर्डर से महज़ 2 किलोमीटर दूर राजस्थान की ज़मीन पर ही गुजारे थे. उनकी याद में श्रीगंगानर ज़िले में ‘लैला-मजनू’ की मज़ार बनी है.

वाह रे ये दुनिया… जीते जी तो उन्हें एक होने न दिया और जब वो मर गए तो उनकी मज़ार बना दी. वैसे अगनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर में बनी इस मज़ार पर आज के ज़माने के ‘लैला-मजनू’ अपने प्यार के लिए मन्नतें मांगने आते हैं.

 

जून में लगता है मेला :

लैला-मजनू के इस मजार पर हर साल 15 जून  को दो दिन का मेला लगता है। जिसमें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रेमी और नवविवाहित जोड़े आते हैं और अपने सफल विवाहित जीवन की कामना करते हैं। खास बात यह है कि इस मेले में सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सिख और ईसाई भी शरीक होते हैं। यह पवित्र मजार प्रेम के सबसे बड़े धर्म की एक मिसाल है।
पहले यह मेला एक दिन का हुआ करता था पर अब इसे पांच दिन का कर दिया गया है।  इस मेले में बड़ी संख्या में प्रेमी युगल आते हैं, प्यार की कसमें खाते हैं और हमेशा हमेशा साथ रहने की मन्नतें मांगते हैं। स्थानीय लोगों में इन दोनों मज़ारों के लिए बहुत मान्यता है और  दोनों समुदाय ही इन मज़ारों को लैला मजनूं से जोड़कर देखते हैं और उनके प्रेम को नमन करते हैं। पहले इस मज़ारों के ऊपर एक छतरी थी। लेकिन ऊपर छतरी कालांतर में हटा दी गई या ढह गई। बाद में लोगों ने इनके ऊपर एक गुम्बद का निर्माण करवा दिया। एक रोचक बात यह है की सेना ने अपनी नजदीकी चौकी  का नाम ही मजनू चौकी  रखा है। लैला-मजनू , जिनके प्यार की मिसाल आज भी दी जाती है, का अंतिम स्मारक राजस्थान में स्तिथ है। प्रेम तथा धार्मिक आस्था की प्रतिक ‘लैला मजनूं की मज़ार’ राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ तहसील में भारत-पाकिस्तान सीमा पर बसे बिन्जौर गाँव में स्तिथ है।  यह जगह पाकिस्तान से महज़ 2 किलो मीटर दूर है। कहते है लैला और मजनू ने अपने प्यार में विफल होने पर यही जान दी थी।  ख़ास बात यह है की जीते-जी चाहे वो न मिल पाये लेकिन उन दोनो की मज़ारे पास पास है। हालांकि कुछ लोग इन्हे लैला मजनू की मजार न मान कर किसी अज्ञात गुरु शिष्य कि मजार मानते है।

 

लैला मजनू का इतिहास

Laila – Majnu story in Hindi Language

 

लैला मजनूं की मज़ार :

स्थानीय निवासी गौरव कालरा कहते हैं, “हर साल यहां सकड़ों जोड़े लैला-मजनू का अशीर्वाद लेने आते हैं। मैं नहीं जानता कि लैला मजनू थे या नहीं, लेकिन पिछले 10-15 वर्षो में यहां आने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है।”यहां आने वाले सभी मजहबों के लोग होते हैं। कालरा ने बताया, “सिर्फ हिंदू और मुसलमान ही नहीं बल्कि सिख एवं ईसाई भी इस मेले में आते हैं।”

हिन्दू और मुस्लिम दोनों की आस्था का है केंद्र :
इस जगह पर हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही श्रद्धालु आकर सर झुकाते है।  कारगिल युद्ध से पहले तक तो यह स्थान पाकिस्तानी श्रद्धालुओं के लिए भी खुला था लेकिन युद्ध के बाद सीमा पर लगे फाटक को बंद कर दिया गया। इस स्थल को मुस्लिम लैला मजनूं की मज़ार कहते हैं और हिंदू इसको लैला मजनूं की समाधि कहते हैं।

लैला-मजनू के इस मजार पर होता है इलाज-ए-इश्क़!

आज भी जब कहीं इश्क फ़रमाते हुए प्रेमी युगल (लव-बर्डस्) दिखते हैं तो लोग यही कहते हैं वो देखो लैला-मजनू… और कहें भी क्यों न अब जहां प्यार की बात आए वहां लैला-मजनूं का नाम न आए, ऐसा कभी हो सकता है? आप पर भी कभी न कभी मजनू या लैला का भूत चढ़ा ही होगा। दुनिया में सैकड़ों साल बाद भी लैला-मजनू की प्रेम कहानी अमर है। सुनने में तो आता है कि इसका इतिहास कहीं न कहीं भारत से भी नाता रखता है। कहा जाता है कि दोनों ने अपनी ज़िंदगी के आखिरी लम्हे पाकिस्तान बॉर्डर से महज़ 2 किलोमीटर दूर राजस्थान की ज़मीन पर ही गुजारे थे।उनकी याद में श्रीगंगानर ज़िले में ‘लैला-मजनू’ की मजार बनी है.. (मतलब ये सही है इस ज़ालिम दुनिया ने जीते जी तो उन्हें एक होने न दिया और जब वो मर गए तो उनका मजार बना दिया)। वैसे अगनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर में बनी इस मजार पर आज के ज़माने के लैला-मजनू अपने प्यार की मन्नतें मांगने आते हैं।

 

यही हुई थी उनकी मृत्यु :
लैला मजनू की मौत यही हुई थी यह तो सब मानते है पर लैला मजनूं की मौत कैसे हुई इसके बारे में कई मत है । कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और आखिर उसने क्रूर तरीके से मजनूं की हत्या कर दी। लैला को जब इस बात का पता चला तो वह मजनूं के शव के पास पहुंची और वहीं उसने खुदकुशी करके अपनी जान दे दी। कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर दर भटकने के बाद वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अपने परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ जान दे देने का फैसला कर लिया था और आत्महत्या कर ली।

मृत्यु पर अनेक मत

भारत में स्थित बिजनौर के स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार लैला मजनूं मूल रूप से सिंध प्रांत के रहने वाले थे। एक दूसरे से उनका प्रेम इस हद तक बढ़ गया कि वे एक साथ जीवन जीने के लिए अपने-अपने घर से भाग निकले और भारत के बहुत सारे इलाकों में छुपते फिरे। आखिर वे दोनों राजस्थान आ गए। जहां उन दोनों की मृत्यु हो गई। लैला मजनूं की मौत के बारे में ग्रामीणों में एक राय नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और आखिर उसने निर्ममता से मजनूं की हत्या कर दी। लैला को जब इस बात का पता चला तो वह मजनूं के शव के पास पहुंची और वहीं उसने खुदकुशी करके अपनी जान दे दी। कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर दर भटकने के बाद वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अपने परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ जान दे देने का फैसला कर लिया था और आत्महत्या कर ली। दोनों के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानियां यहीं खत्म नहीं होती है। ग्रामीणों में एक अन्य कहानी भी प्रचलित है जिसके अनुसार लैला के धनी माता पिता ने जबरदस्ती उसकी शादी एक समृद्ध व्यक्ति से कर दी थी। लैला के पति को जब मजनूं और लैला के प्रेम का पता चला तो वह आग बबूला हो उठा और उसने लैला के सीने में एक खंजर उतार दिया। मजनूं को जब इस वाकये का पता चला तो वह लैला तक पहुंच गया। जब तक वह लैला के दर पर पहुंचा लैला की मौत हो चुकी थी। लैला को बेजान देखकर मजनूं ने वहीं आत्महत्या कर अपने आप को खत्म कर लिया।

प्रसिद्धि

लैला मजनूं की प्रेम कहानी किसी काल्पनिक कहानी से कम नहीं। लेकिन यह सच है। सदियों से लैला मजनूं की दास्तान सुनी और सुनाई जाती है और आज भी यह कहानी अमर है। यह उस दौर की कहानी है जब प्रेम को बर्दाश्त नहीं किया जाता था और प्रेम को एक सामाजिक बुराई की तरह देखा जाता था। लैला मजनूं का प्रेम लंबे समय तक चला और आखिर इसका अंत दुखदायी हुआ। दोनों जानते थे कि वे कभी एक साथ नहीं रह पाएंगे। इसीलिए उन्होंने मौत को गले लगा लिया। एक दूसरे के लिए प्रेम की इस असीम भावना के साथ दोनों सदा के लिए इस दुनिया से दूर चले गए। उनके प्रेम की पराकाष्ठा यह थी कि लोगों के उन दोनों के नाम के बीच में ’और’ लगाना भी मुनासिब नहीं समझा एवं दोनो हमेशा ’लैला-मजनूं’ के रूप में ही पुकारे गए। बाद में प्यार करने वालों के लिए यह बदनसीब प्रेमी युगल एक आदर्श बन गया। प्रेम में गिरफ्तार हर लड़की को लैला कहा जाने लगा और प्यार में दर-दर भटकने वाले आशिक को मजनूं की संज्ञा दी जाने लगी। लैला मजनूं के प्रेम की अनगिनत दास्तानें पूरी दुनिया में फैली हुई हैं। कई भाषाओं और कई देशो में लैला मजनूं पर फ़िल्में और संगीत भी रचा गया है जो अद्भुत तरीक़े से बहुत सफल हुआ है। शायद ही असल कहानी का किसी को पता हो लेकिन यह सच है कि लैला मजनूं ने एक दूसरे से अपार प्रेम किया और जुदाई ने दोनों की जान ले ली।

कैसे हुई थी इनकी मौत
श्रीगंगानर ज़िले में ‘लैला-मजनू’ की एक मजार बनी है। अनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर में बनी इस मजार पर आज के ज़माने के लैला-मजनू अपने प्यार की मन्नतें मांगने आते हैं। लोगों का मानना हैं किलैला-मजनू सिंध प्रांत के रहने वाले थे। उनकी मौत यहीं हुई थी यह तो सब मानते हैं, लेकिन मौत कैसे हुई इस बारे में कई मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने क्रूर तरीके से मजनू की हत्या कर दी। लैला को यह पता चलते तो वह मजनू के शव के पास पहुंची और उसने खुदकुशी कर ली। हालांकि कुछ लोग अपना दूसरा मत रखते हैं, इनका कहना है कि घर से भाग कर दर-दर भटकने के बाद ये दोनो यहां तक पहुंचे और प्यास से दोनों की मौत हो गई।

कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर-दर भटकने के बाद, वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ आत्महत्या कर ली.

हर साल 15 जून को लैला-मजनू की मज़ार पर दो दिन का मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रेमी और नवविवाहित जोड़े आते हैं और अपने सफल वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं. खास बात यह है कि मेले में सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सिख और ईसाई भी शरीक होते हैं. यह पवित्र मज़ार प्रेम करने वालों के लिए बेहद ख़ास है.

अतीत के इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी सम्मान दिया है. भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित एक पोस्ट को बीएसएफ की ‘मजनू पोस्ट’ नाम दिया है. कारगिल युद्ध से पहले मज़ार पर आने के लिए पाकिस्तान से खुला रास्ता था, लेकिन इसके बाद आतंकी घुसपैठ के चलते इसे बंद कर दिया गया है.

जो भी कहिए, लेकिन प्यार के लिए ज़िन्दगी को भी हंसकर क़ुर्बान करने वाले लैला-मजनू प्रेम करने वालों के लिए प्रेरणा तो हैं ही. इनके नक़्शे-कदम पर चलने की सलाह तो हम आपको नहीं देंगे, लेकिन इतना ज़रूर कहेंगे कि प्यार का सम्मान करना चाहिए. उसे नियमों में जकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. क्योंकि सच्चा प्यार एक बार हो गया, तो हो ही गया. वैसे इस पोस्ट को शेयर कर सकते हैं आप.

बॉर्डर पर भी बनाई है मजनू पोस्ट

दुनिया में अतीत के इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी पूरा सम्मान दिया है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित एक पोस्ट को बीएसएफ की ‘मजनू पोस्ट’ नाम दिया है। कारगिल युद्ध से पहले मजार पर आने के लिए पाकिस्तान से खुला रास्ता था, लेकिन इसके बाद आतंकी घुसपैठ के चलते इसे बंद कर दिया गया|

 

 

 

 

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