Maa poem in Hindi

Amazing Poem – Maa Poem in Hindi

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जब आँख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था

जब आँख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था,
उसका नन्‍हा सा आँचल मुझे भूमण्‍डल से प्‍यारा था..!

उसके चेहरे की झलक देख चेहरा फूलों सा खिलता हैं,
उसके स्‍तन की एक बूंद से मुझको जीवन मिलता हैं..!

हाथों से बालों को नोचा, पैरों से खूब प्रहार किया,
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमको जी भर के प्‍यार किया..!

मैं उसका राजा बेटा हूँ वो आँख का तारा कहती हैं,
मैं बनूँ बुढ़ापे में उसका बस एक सहारा कहती हैं..!

उंगली को पकड़ चलाया था पढ़ने विद्यालय भेजा था,
मेरी नादानी को भी निज अन्‍तर में सदा सहेजा था..!

मेरे सारे प्रश्‍नों का वो फौरन जवाब बन जाती हैं,
मेरी राहों के काँटे चुन वो ख़ुद ग़ुलाब बन जाती हैं..!

माँ ही हैं जो ख़ुद भूखी रह करके हमें खिलाती थी,
हमको सूखा बिस्‍तर देकर ख़ुद गीले में सो जाती थी..!

माँ ही हैं जिसने होठों को भाषा सिखलाई थी,
मेरी नींदों के लिए रात भर उसने लोरी गाई थी..!

माँ ही हैं जिसने हर ग़लती पर डाँटा समझाया था,
बच जाऊँ बुरी नज़र से काला टीका सदा लगाया था..!

माँ की ममता को देख मौत भी आगेसे हट जाती है,
गर माँ अपमानित होती, धरती की छाती फट जाती है..!

घर को पूरा जीवन देकर बेचारी माँ क्‍या पाती है,
रूखा सूखा खा लेती है, पानी पीकर सो जाती है..!

जो माँ जैसी देवी घर के मंदिर में नहीं रख सकते हैं,
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें इंसान नहीं बन सकते हैं..!

माँ जिसको भी जल दे दे वो पौधा संदल बन जाता है,
माँ के चरणों को छूकर पानी गंगाजल बन जाता है..!

माँ के आँचल ने युगों-युगों से भगवानों को पाला है,
माँ के चरणों में जन्नत है गिरिजाघर और शिवाला है..!

हिमगिरि जैसी ऊँचाई है, सागर जैसी गहराई है,
दुनिया में जितनी ख़ुशबू है माँ के आँचल से आई है..!

माँ कबिरा की साखी जैसी, माँ तुलसी की चौपाई है,
मीराबाई की पदावली ख़ुसरो की अमर रुबाई है..!

माँ आंगन की तुलसी जैसी पावन बरगद की छाया है,
माँ वेद ऋचाओं की गरिमा, माँ महाकाव्‍य की काया है..!

माँ मानसरोवर ममता का, माँ गोमुख की ऊँचाई है,
माँ परिवारों का संगम है, माँ रिश्‍तों की गहराई है..!

माँ हरी दूब है धरती की, माँ केसर वाली क्‍यारी है,
माँ की उपमा केवल माँ है, माँ हर घर की फुलवारी है..!

सातों सुर नर्तन करते जब कोई माँ लोरी गाती है,
माँ जिस रोटी को छू लेती है वो प्रसाद बन जाती है..!

माँ हँसती है तो धरती का ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है,
देखो तो दूर क्षितिज अंबर धरती को शीश झुकाता है..!

माना मेरे घर की दीवारों में चन्‍दा-सी मूरत है,
पर मेरे मन के मंदिर में बस केवल माँ की मूरत है..!

माँ सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, दुर्गा, अनुसूया, मरियम, सीता है,
माँ पावनता में रामचरितमानस्, भगवद्गीता है..!

अम्‍मा तेरी हर बात मुझे वरदान से बढ़कर लगती है,
हे माँ तेरी सूरत मुझको भगवान से बढ़कर लगती है..!

सारे तीरथ के पुण्‍य जहाँ, मैं उन चरणों में लेटा हूँ,
जिनके कोई सन्‍तान नहीं, मैं उन माँओं का बेटा हूँ..!

हर घर में माँ की पूजा हो ऐसा संकल्‍प उठाता हूँ,
मैं दुनिया की हर माँ के चरणों में ये शीश झुकाता हूँ..!!

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हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….

हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….
कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..
हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..
अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……
हमारी खुशियोँ मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….
जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..

दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..
खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….
प्यार भरे हाथोँ से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..
बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……
रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….
लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….
भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ

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मेरे सर्वस्व की पहचान

मेरे सर्वस्व की पहचान
अपने आँचल की दे छाँव
ममता की वो लोरी गाती
मेरे सपनों को सहलाती
गाती रहती, मुस्कराती जो
वो है मेरी माँ।

प्यार समेटे सीने में जो
सागर सारा अश्कों में जो
हर आहट पर मुड़ आती जो
वो है मेरी माँ।

दुख मेरे को समेट जाती
सुख की खुशबू बिखेर जाती
ममता की रस बरसाती जो
वो है मेरी माँ।

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मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान

मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

 माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया

ठुमक-ठुमक आँगन में चलकर सबका हृदय जुड़ाया
पुत्र प्रेम में थे निमग्न कौशल्या माँ के प्राण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

दे मातृत्व देवकी को यसुदा की गोद सुहाई
ले लकुटी वन-वन भटके गोचारण कियो कन्हाई
सारे ब्रजमंडल में गूँजी थी वंशी की तान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

तेरी समता में तू ही है मिले न उपमा कोई
तू न कभी निज सुत से रूठी मृदुता अमित समोई
लाड़-प्यार से सदा सिखाया तूने सच्चा ज्ञान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

कभी न विचलित हुई रही सेवा में भूखी प्यासी
समझ पुत्र को रुग्ण मनौती मानी रही उपासी
प्रेमामृत नित पिला पिलाकर किया सतत कल्याण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

‘विकल’ न होने दिया पुत्र को कभी न हिम्मत हारी
सदय अदालत है सुत हित में सुख-दुख में महतारी
काँटों पर चलकर भी तूने दिया अभय का दान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान

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साल के बाद
आया है यह दिन
करने लगे हैं सब याद
पल छिन
तुम ना भूली एक भी चोट या खुशी
ना तुमने भुलाया
मेरा कोई जन्म दिन
और मैं
जो तुम्हारी परछाई हूँ
वक्त की चाल-
रोज़गार की ढाल
सब बना लिए मैंने औज़ार
पर माँ!
नासमझ जान कर
माफ़ करना
करती हूँ तुमको प्यार
मैं हर पल
खामोशी तनहाई में
अर्पण किए
मैंने अपनी श्रद्धा के फूल तुमको
जानती हूँ
मिले हैं वो तुमको
क्योंकि
देखी है मैंने तुम्हारी निगाह
प्यार गौरव से भरी मुझ पर
जब भी मैं तुम्हारे बताए
उसूलों पर चलती हूँ चुपचाप
माँ!
मुझमें इतनी शक्ति भर देना
गौरव से सर उठा रहे तुम्हारा
कर जाऊँ ऐसा कुछ जीवन में
बन जाऊँ
हर माँ की आँख का सितारा
आज मदर्स डे के दिन
“अर्चना” कर रही हूँ मैं तुम्हारी
श्रद्धा, गौरव और विश्वास के चंद फूल लिए

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माँ प्यारी माँ

माँ प्यारी माँ

कोशिश की थी
कविता लिखने की
बरसों पहले
छोटी-सी आयु में

सीख रहा था छंद कोई
पंक्ति बन रही थी
‘माँ, प्यारी माँ’
तेरे ऋण है मुझ पर हज़ार

बढ़ न सका आगे
उलझनों में रह गया
बढ़ रहा हूँ आज
माँ प्यारी माँ

तीरथ करती हो
करते रहना
पुण्य करती हो
करते रहना

छत है तेरे पुण्यों की
करेगी रक्षा हम बच्चों की
माँ प्यारी माँ

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जन्म दात्री

जन्म दात्री
ममता की पवित्र मूर्ति
रक्त कणो से अभिसिंचित कर
नव पुष्प खिलाती

स्नेह निर्झर झरता
माँ की मृदु लोरी से
हर पल अंक से चिपटाए
उर्जा भरती प्राणो में
विकसित होती पंखुडिया
ममता की छावो में

सब कुछ न्यौछावर
उस ममता की वेदी पर
जिसके
आँचल की साया में
हर सुख का सागर!

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नि:शब्द है

नि:शब्द है
वो सुकून
जो मिलता है
माँ की गोदि मे
सर रख कर सोने मे

वो अश्रु
जो बहते है
माँ के सीने से
चिपक कर रोने मे

वो भाव
जो बह जाते है अपने ही आप

वो शान्ति
जब होता है ममता से मिलाप

वो सुख
जो हर लेता है
सारी पीडा और उलझन

वो आनन्द
जिसमे स्वच्छ
हो जाता है मन

माँ आँखों से ओझल होती

माँ आँखों से ओझल होती,
आँखें ढूँढ़ा करती रोती।
वो आँखों में स्‍वप्‍न सँजोती,
हर दम नींद में जगती सोती।

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वो मेरी आँखों की ज्‍योति‍

वो मेरी आँखों की ज्‍योति‍
मैं उसकी आँखों का मोती।
कि‍तने आँचल रोज भि‍गोती,
वो फि‍र भी ना धीरज खोती।

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कहता घर मैं हूँ इकलौती

कहता घर मैं हूँ इकलौती,
दादी की मैं पहली पोती।
माँ की गोदी स्‍वर्ग मनौती,
क्‍या होता जो माँ ना होती।

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नहीं जरा भी हुई कटौती

नहीं जरा भी हुई कटौती,
गंगा बन कर भरी कठौती।
बड़ी हुई मैं हँसती रोती,
आँख दि‍खाती जो हद खोती।

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शब्‍द नहीं माँ कैसी होती

शब्‍द नहीं माँ कैसी होती,
माँ तो बस माँ जैसी होती।
आज हूँ जो, वो कभी न होती,
मेरे संग जो माँ ना होती।।

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अंदर से रोती फिर भी बाहर से हँसती है

अंदर से रोती फिर भी बाहर से हँसती है
बार-बार जूड़े से बिखरे बालों को कसती है
शादी होती है उसकी या वो बिक जाती है
शौक,सहेली,आजादी मायके में छुट जाती है
फटी हुई एड़ियों को साड़ी से ढँकती है
खुद से ज्यादा वो दुसरो का ख्याल रखती है
सब उस पर अधिकार जमाते वो सबसे डरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

शादी हकोर लड़की जब ससुराल में जाती है
भूलकर वो मायका घर अपना बसाती है
घर आँगन खुशियो से भरते जब वो घर में आती है
सबको खाना खिलाकर फिर खुद खाती है
जो घर संभाले तो सबकी जिंदगी सम्भल जाती है
लड़की शादी के बाद कितनी बदल जाती है।
गले में गुलामी का मंगलसूत्र लटक जाता है
सिर से उसका पल्लू गिरे तो सबको खटक जाता है
अक्सर वो ससुराल की बदहाली में सड़ती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

आखिर क्यों बिक जाती, औरत इस समाज में?
क्यों डर-डर के बोलती, गुलामी की आवाज में?
गुलामी में जागती हैं, गुलामी में सोती हैं
दहेज़ की वजह से हत्याएँ जिनकी होती हैं
जीना उसका चार दीवारो में उसी में वो मरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

जिस दिन सीख जायेगी वो हक़ की आवाज उठाना
उस दिन मिल जायेगा उसे सपनो का ठिकाना
खुद बदलो समाज बदलेगा वो दिन भी आएगा
जब पूरा ससुराल तुम्हारे साथ बैठकर खाना खायेगा
लेकिन आजादी का मतलब भी तुम भूल मत जाना
आजादी समानता है ना की शासन चलाना
असमानता के चुंगल में नारी जो फँस जाती है
तानाशाही का शासन वो घर में चलाती है
समानता से खाओ समानता से पियो
समानता के रहो समानता से जियो
असमानता वाले घरों की, एक ही पहचान होती है
या तो पुरुष प्रधान होता या महिला प्रधान होती है
रूढ़िवादी घर की नारी आज भी गुलाम है
दिन भर मशीन की तरह पड़ता उन पे काम है
दुःखों के पहाड़ से वो झरने की तरह झरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

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सबसे सुंदर सबसे प्यारी

सबसे सुंदर सबसे प्यारी
मेरी माँ  है सबसे न्यारी ।
मुझ पर प्यार ममता बरसाती   ॥
करू  गलत काम तो मार लगाती  ।
माँ  तु  है सबसे महान ॥
अब यही है बस अरमान  ।
माँ की महिमा का बखान करते करते निकले प्राण  ॥
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Updated: November 14, 2017 — 1:13 pm

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