Maharana Pratap History In Hindi

Maharana Pratap History in Hindi Language

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय और इतिहास

 

वैसे तो भारतभूमि अनेक महान योद्धाओ के जीवन, त्याग बलिदान और बहादुरी के गाथाओ से इतिहास भरा पड़ा है उनमे से प्रमुख रूप से महाराणा प्रताप का भी नाम आता है जिनके बहादुरी के किस्से सुनकर लोग दातो तले ऊँगली दबा लेते है | तो आईये जानते है महाराणा प्रताप के जीवन इतिहास और उनसे जुडी हुई शौर्य गाथाये जो आज भी स्वतंत्रता की राह पर चलने का मार्ग दिखाते है |

Maharana Pratap Story in Hindi

“हमारा देश भारतवर्ष जैसा है वैसा रहेगा, हमारा हिन्दू धर्म जैसा है वैसा रहेगा पर जल्द ही एक ऐसा समय आएगा जब इन मुगलों का नामों निशान इस भारत की पवित्र मिटटी से मिट जाएगी”- महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप का संशिप्त विवरण:-

  • जन्म:- 9 मई 1540
  • म्रत्यु:- 29 जनवरी 1597
  • घोडा:- चेतक
  • पिता का नाम:- राणा उदय सिंह
  • माता का नाम:- जैवन्ता बाई जी
  • पत्नी का नाम:- अजबदे
  • पुरता का नाम:- अमर सिंह

सिसोदिया पिता: उदय सिंह ॥

माता: महारानी जैवन्ता बाई धर्म:

हिन्दु राज समय:

24 साल 327 दिन ||

महाराणा प्रताप परिचय:-

महाराणा प्रताप  का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ था | महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजा थे, मेवाड़ आज के राजस्थान का एक हिस्सा था, जिस पर राजपूताना लोग शासन करते थे। महाराणा प्रताप के पिता राणा उदय सिंह॥ सिसोदिया वंश के 12 राजा थे। महाराणा प्रताप राजा  उदय सिंह और रानी महारानी जैवन्ता बाई के सबसे बड़े पुत्र थे। महाराणा प्रताप अपने युद्ध कौशल, राजनीतिज्ञ, आदर्श संगठनकर्ता और अपने धर्म और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर रहने वाले महान सेनानी थे | महाराणा प्रताप ने कुल 11 शादिया की थी महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी पत्नी का नाम अज्बदे पुनवर था तथा इनकी 17 पुत्र थे जिनमे अमर सिंह इनके ज्येष्ठ पुत्र थे |

महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है –

  • महारानी अजब्धे पंवार:- अमरसिंह और भगवानदास
  • अमरबाई राठौर:- नत्था
  • शहमति बाई हाडा:-पुरा
  • अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह
  • रत्नावती बाई परमार:-माल,गज,क्लिंगु
  • लखाबाई:- रायभाना
  • जसोबाई चौहान:-कल्याणदास
  • चंपाबाई जंथी:- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
  • सोलनखिनीपुर बाई:- साशा और गोपाल
  • फूलबाई राठौर:-चंदा और शिखा
  • खीचर आशाबाई:- हत्थी और राम सिंह

महाराणा प्रताप बचपन से बड़े प्रतापी वीर योद्धा थे तथा वे स्वाभिमानी और किसी के अधीन रहना स्वीकार नही करते थे | महाराणा प्रताप इतने बड़े वीर थे की वे कई बार अकबर को युद्ध में पराजित भी किये थे उनकी यही वीरता के किस्से इतिहास के पन्नो में भरे पड़े है जिसके फलस्वरूप अकबर ने शांति प्रस्ताव के लिए 4 बार शांतिदूतो को महाराणा प्रताप के पास भेजा जिसके लिए महाराणा प्रताप ने पूरी तरह से हर बार अधीनता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था इन शांतिदूतो में जलाल खान, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल थे | वे स्वतंत्राप्रेमी थे जिसके कारण वे अपने जीवन में कभी भी मुगलों के आगे नही झुके उन्होंने कई वर्षो तक कई बार मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किये उनकी इसी दृढ वीरता के कारण बादशाह अकबर भी सपने में महाराणा प्रताप के नाम से कापता था |

महाराणा प्रताप कहते थे मै पूरी जिन्दगी घास की रोटी और पानी पीकर जिन्दगी गुजार सकता हूँ लेकिन किसी की पराधीनता मुझे तनिक भी स्वीकार नही है” जिसके चलते महाराणा प्रताप पूरी जिन्दगी मुगलों से संघर्ष करते रहे और फिर 19 जनवरी 1597 को दुर्घटना में घायल होने के पश्चात अपने प्राणों को गवा देते है | भले ही महाराणा प्रताप इस दुनिया को छोड़कर चले गये लेकिन उनके बहुदुरी के किस्से आज भी जनमानस में अति प्रसिद्द है |

एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए |

अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर, शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम|

Maharana Pratap History in Hindi Language

महाराणा प्रताप बाल्य जीवन:-

महाराणा प्रताप के पिता राणा उदय सिंह एक महान योद्धा थे | महराणा उदय सिंह की जीवन रक्षा की कहानी पन्ना धाय से जुडी हुई है, उदय सिंह के पिता राणा रतन सिंह के मृत्यु के पश्चात उदय सिंह के बड़े भाई विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली | विक्रमादित्य अभी थोड़े छोटे थे इसलिए उनकी देखरेख का जिम्मा बनवीर को दिया गया, लेकिन थोड़े ही दिन में बनवीर के मन में राजगद्दी हथियाने के इच्छा जागृत हो गयी. उसने कुछ सामंत को अपने में मिला लिया और जो सामंत उनके विरुद्ध गए उनकी हत्या कर दिया | उसके बाद उसने विक्रमादित्य को भी मार डाला, और फिर चल दिया मेवाड़ के एकलौते वरिश उदय सिंह की हत्या करने उस समय उदय सिंह सो रहे थे और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह को मारने आ रहा था, अचानक से महल में हलचल पैदा हो गयी और ये समाचार पन्ना धाय तक भी पहुँच गयी, पन्ना धाय ने उस फूलों की टोकरी के साथ कुम्भलगढ़ पहुँच गयी | कुम्भलगढ़ में आशा शाह देपुरा को कुंवर उदय सिंह को सौंपकर पन्ना धाय चित्तोड़ वापस चली आई, उस समय उदय सिंह की आयु केवल 15 वर्ष की थी | यहीं पर उदय सिंह ने शिक्षा प्राप्त की | उन्होंने फिर जयवंताबाई से शादी की. प्रताप सिंह इन दोनों के ही पुत्र थे | प्रताप का जन्म ही युद्ध के दौरान हुआ था, एक तरफ उदय सिंह अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए बनवीर से युद्ध कर रहे थे और इसी शुभ क्षण में भगवान एकलिंग का अवतार लिए प्रताप सिंह धरती में पधारे| उनके जन्म के उत्सव में चार चाँद तब लग गए जब ये खबर आई की महाराणा उदय सिंह बलवीर को हरा वापस चित्तोड़ के किला पर अपना अध्यापत स्थापित कर चुके है, प्रताप के जन्म की उत्सव चित्तोडगढ के किला में ही बड़े धूम धाम से मनाया गया |

राणा उदय सिंह जब भी प्रताप को देखते थे वो हर्ष उल्लास से भर जाते थे, राणा प्रताप को विश्वास था की उनके बाद मेवाड़ का भविष्य एक सुरक्षित हाथों में जाने वाला है | इसी सोच के साथ लगातार उदय सिंह गुप्त रूप से अपनी सेना को एक जुट करने में लग गए| लगभग 10 साल के लम्बे समय के बाद उदय सिंह ने अफगानों में आक्रमण करने का निर्णय लिया, वे अपने सभी राजकुमारों को किसी सुरक्षित स्थान में पहले पहुंचा देना चाहते थे पर प्रताप जो की अभी केवल 13 साल के ही थे किसी तरह उनको युद्ध की खबर हो गयी, वो इस युद्ध से कैसे अनछुए रह सकते है इसलिए अपने पिता के आज्ञा के बगैर उस युद्ध में कूद गए, थोड़े ही समय में युद्ध शुरू हो गया, और प्रताप इतनी कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा की चमक चारों ओर बिखेरने लगे थे, इस युद्ध में कई राजपूत सिपाहियों ने प्रताप का भरपूर साथ दिए, अब सम्पूर्ण मेवाड़ में उदय सिंह का राज था | इस तरह से प्रताप सिंह की खायाति पूरे राजपूताने में फैलने लगी, मेवाड़ की प्रजा प्रताप के स्वाभाव से अत्यंत प्रसन्न रहती | क्योंकि कभी कभी प्रताप तो उनकी मदद करने में इतने खो जाते थे की वे भूल जाते थे की वो एक राजकुमार है | और इस तरह प्रताप अपने वीरता की गाथा को बिखरते हुए बड़े होने लगे |

अकबर का चितौड़गढ़ में आक्रमण:-

जब प्रताप 14 वर्ष के थे तब मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर ने 13 वर्ष की उम्र में दिल्ली का सम्राट बना | उस समय वो बहुत छोटा था इसलिए बैरम खान की संरक्षण में वो दिल्ली की राजगद्दी संभाला | सम्राट बनते ही उसने आमेर के कछावा राजाओं से संधि कर ली और फिर शीघ्र ही महाराणा उदय सिंह के पास प्रस्ताव भेज दिया की वो मुग़ल-सत्ता की अधीनता को स्वीकार कर ले | महाराणा उदय सिंह ने इस संधि का जवाब बहुत ही कड़े शब्दों में दिया और जवाब में लिख दिया की हम कभी किसी विदेशी ताकत के आगे नहीं झुक सकते है | इससे क्रोधित होकर अकबर ने 20 अक्टूबर सन 1567 एक बड़ी विशाल सेना लेकर बैरम खान के नेतृत्व में चितौड़ पर आ धमका | चितौड़ को मुग़ल सेना ने चारों ओर से घेर लिया गया इसके बावजूद मुग़ल सेना चितौड़ के अन्दर न घुस पायी, मैं आपको बता देना चाहूँगा की चितौड़ का किला सबसे बड़ा किला माना जाता है | 6 महीने तक महाराणा उदय सिंह, प्रताप और समस्त चितौड़गढ़ के सेना ने बड़े ही वीरता के साथ मुगलों को सामना किया | परन्तु राशन पानी बंद हो जाने के कारण उदय सिंह मुगलों का ज्यादा देर तक सामना न कर सके लगभग 6 महीने की भीषण संग्राम के बाद 23 फरवरी को उदय सिंह को समस्त परिवार के साथ चितौड़ छोड़ना पड़ा, उन्होंने पहाड़ियों से घिरे सुरम्य स्थल उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया और फिर वहीँ रहने लगे |

उदय सिंह को पहले से ही यह एहसास था की छोटी रानी जगमाल को राजा बनाना चाहती है, परन्तु आज छोटी रानी ने उदय सिंह को इस प्रकार से घेर लिया था की उससे उनका चैन और सुख जाता रहा, वे परेशान हो गए और अंततः जगमाल को उतराधिकारी घोषित करना पड़ा | उसके उतराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद ही महाराणा उदय सिंह स्वर्ग सिधार गए | जिसने भी यह सुना की जगमाल मेवाड़ का उतराधिकारी है वह उदय सिंह की आलोचना करने लगा | सारे प्रजा में निराशा की लहर दौड़ गयी परन्तु प्रताप ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया उन्होंने अपने पिता के फैसले का सम्मान किया और जगमाल को मेवाड़ का नया राणा बनने में ख़ुशी जाहिर किया |

जगमाल का उत्ताराधिकारी घोषित करना:-

मेवाड़ की सारी प्रजा और सभी राजपूत युवक और सामंत जिनकी भुजा राणा उदय सिंह में हुए आक्रमण का बदला लेने के लिए मचल रही थी उनको प्रताप का राणा न बन पाने की फैसला बिलकुल भी अच्छी नहीं लग रही थी | पर वो सभी महल की राजनीती के विरुद्ध नहीं जा पाए | प्रताप के मन में अपने पिता के प्रति अपार श्रद्धा और आदर था, इसलिए जगमाल का उन्होंने जरा भी विरोध न किया, उन्होंने अपने सारे सामंत को अच्छी तरह से समझा बुझा कर जगमाल के साथ कर दिया | रानी भटियानी प्रताप की शोर्य और सामंतों के बीच उनके प्रभावों से भली भांति परिचित थी, उसे सर था की प्रताप कहीं जगमाल से राज्गद्दी न छीन ले, इसलिए रानी भटियानी ने जगमाल को सावधान कर दिया था की वो प्रताप से जरा संभल कर रहे |

जगमाल किसी भी कीमत में मेवाड़ की गद्दी संभालने योग्य न था, वो भोग विलास में सदैव डूबा रहता था, जगमाल प्रताप की मदद से अपने सभी कमजोरियों को दूर कर सकता था पर जगमाल प्रताप को अपने पास तक भटकने नहीं देता, हर बात में प्रताप को निचा दिखाना और अपने राणा होने का गलत फायदा उठाना अब तो जगमाल के लिए ये आम बात हो गयी थी | कई पुराने सामंत उससे असंतुष्ट रहने लगे | प्रताप अपने स्तर से राज्य की स्थिति को संभालने में प्रयासरत थे | पर जब उन्होंने देखा की राज्य की भविष्य अब अंधकारमय हो चूका है तो उन्होंने एक बड़े भाई के अधिकार से जगमाल को समझाने जा पहुंचे| जगमाल ने प्रताप को देखकर उपरी तौर से पूरा आदर दिखाया | प्रताप ने जगमाल को समझाया की राज्य का बोझ अकेले नहीं उठाया जा सकता इसके लिए उसे सरदारों के राय की आवश्यकता पड़ती है इसलिए तुम्हे पुराने सरदारों के साथ विश्वास को बनाये रखना चाहिए और उनका पूरा पूरा समर्थन और सम्मान देना चाहिए, इतना कहकर प्रताप चले गए | प्रताप का मातृभूमि से निर्वासन की खबर सारे मेवाड़ में आग की तरह फ़ैल गयी | सारी प्रजा जगमाल के विरुद्ध हो गयी | प्रताप को दण्डित करने का अर्थ था की मेवाड़ की जनता को दण्डित करना | प्रताप की ख्यति उस समय तक भारतवर्ष के कोने कोने तक पहुँच चुकी थी |

एक मात्र राजपूत जिसने न केवल अकबर के सामने घुटने न टेके बल्कि अकबर की विशाल सेना की भी कई दिनों तक दांत खट्टे कर के रख दिए और भी कई सारी खूबियों के कारण प्रताप बहुत प्रचलित हो चुके थे इसलिए उनमे न केवल राजपूत जाती और मेवाड़ की ही नजरें टिकी थी वरन सम्पूर्ण भारतवर्ष के अकबर अधीन राजाओं की नजर भी थी और इस तरह से उनका घोर अपमान कर निर्वासन कर देना किसी तरह से क्षमा योग्य न था | अकबर के सेना चित्तोडगढ में अभी भी मुग़ल ध्वज लहराए हुए है और इस दुखद समय में एक और झटका मेवाड़ के जनता कभी में इसे स्वीकार नहीं करेगी | सारे मेवाड़ के लोग हड़ताल करने लगे और जगमाल को बुरा भला कहने लगे | कई सामंत भी जगमाल के विरुद्ध हो गए |

Maharana Pratap History in Hindi Language

प्रताप का महाराणा के रूप में संकल्प:-

प्रताप के निर्वासन की खबर सुन कर पुरे मेवाड़ नगरी की प्रजा में आक्रोश से भर गयी, कई लोग प्रताप की गुणगान करते नही थक रहे थे। कुछ गाँव वाले अपने में बात कर रहे थे की प्रताप ही मेवाड़ के असली महाराणा है, उदय सिंह छोटी रानी भटियानी से ज्यादा प्यार करते थे इसलिए जगमाल को राजा बना दिया जो की दिन भर नशे में धुत रहता है। इसपर दुसरे गाँव वाले ने कहा की सही कहा उस दिन 6 मुग़ल सैनिक हमारी गाँव के एक लड़की के साथ दुष्कर्म कर रहे थे तभी प्रताप वहां पहुँच कर अकेले ही उन छः मुग़ल सैनिकों से भीड़ गए और उसका संहार कर उस लड़की की इज्जत को बचाया। राजपूताने के कई राजा ने तो अकबर के सामने घुटने टेक दिये है एक प्रताप ही उसको चुनौती दे सकते है, वे हमारे स्वाधीनता के अंतिम आशा है और किसी भी हालत में उनका निर्वासन नहीं होने देंगे।

उदयपुर के कई सरदार जगमाल के इस फैसले से पहले से ही बौखलाए हुए थे, उनकी सलाह के बिन जगमाल ने इतनी बड़ी फैसला कैसे कर लिया था। प्रताप के मामा झालावाड़ नरेश इस फैसले से बहुत ज्यादा क्षुब्ध थे, मेवाड़ के कई सामंतों ने अपनी आक्रोश को उनके सामने व्यक्त किया। झालावाड के नरेश ने अपनी नेतृत्व सामंतों को प्रदान किया और यह निर्णय लिया गया की जगमाल को गद्दी से हटाया जायेगा और प्रताप को मेवाड़ का महाराणा बनाया जायेगा। उदयपुर के साथ साथ सारे मेवाड़ की जनता और सामंतों की ओर से सन्देश लेकर मैं आपके पास आया हूँ। क्या आपको अपने पिता से किया वायदा याद नहीं चित्तोडगढ अभी भी मुगलों के हाथ में है और आपको ही उसे मुगलों से आजाद करवाना है। चुण्डावत निकट आते हुए कहा की आपको वापस चलना ही होगा अन्यथा मेवाड़ आपके बिना अनाथ हो जायेगा, मेवाड़ की जनता ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। उनका धैर्य का बाण टूट जायेगा। प्रताप ने कहा की क्या एक एक भाई को भाई के विरुद्ध विद्रोह करना शोभा देगा, विद्रोह तब होगा जब आप नहीं चलोगे, मेवाड़ की जनता अपना संतुलन खो बैठेगी और विद्रोही सरदार अपने म्यान से तलवार निकाल आएगी, और पूरा का पूरा मेवाड़ गृह युद्ध की चपेट में आ जायेगा | इस तरह काफी देर तक बहस करने के बाद प्रताप को एहसास हो गया की चुण्डावत सही कह रहे है, मेवाड़ को उनकी आवश्यकता है और उन्हें मेवाड़ की उन्हें।

अगली ही सुबह जगमाल ने अपने सामने चुण्डावत कृष्ण के साथ प्रताप को देखा तो उसे अपने आँखों में विश्वास न हुआ, रात भर पि हुई मदिरा की नशा एक पल में ही ओझल हो गयी। जगमाल सिंहासन में बैठा था सभी चापलूस सरदार अपनी अपनी ओट लिए हुए था। इतने में चुण्डावत ने अपनी गर्जना भरे स्वर में कहा की “जगमाल छोड़ दो ये सिंहासन” जगमाल ने कहा –“चुण्डावत सरदार आप होश में तो है” “हाँ कुमार” अब हम सब होश में आ गए है। उस दिन हम सब वास्तव में होश में नहीं थे जब महाराणा उदय सिंह ने तुम्हे राणा बनाया था। तुम इसके तनिक भी योग्य नहीं हो। हमने तुम्हे राणा के रूप में अवश्य ही स्वीकार किया है पर तुम इसके जरा भी योग्य नहीं हो तुमने इस सिंहासन का अपमान किया है। जगमाल क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को आदेश दिया की पकड़ लिया जाए इस चुण्डावत सरदार को। पुरे दरबार में सन्नाटा छा गया था। जगमाल झट से अपनी तलवार निकाला और प्रताप की ओर देखते हुए बोला अपनी तलवार निकालो प्रताप अभी फैसला हो जायेगा।

प्रताप बहुत गंभीर थे, गंभीर चेहरे में हलकी सी मुस्स्कान को बड़ी मुस्किल से बाहर आने दे रहे थे। फिर कुछ शब्द उभर कर आये, मेवाड़ के महाराणा की जय, हमारे महाराणा प्रताप की जय। सारे दरबार में महाराणा प्रताप की जय जयकार होने लगी। यह जयजयकार इतनी ऊँची थी की सारा महल इस ध्वनि से गूँज उठा था, मेवाड़ की सेना को और जनता को जब ये समाचार मिला की प्रताप अब महराणा बन चुके है तब उनमे ख़ुशी का ठिकाना न रहा | 

प्रताप को राणा बनते देख पूरा राजपुताना दो खेमों में बंट गया था, वैसे राजाओं ने प्रताप के राणा बनने में ख़ुशी जाहिर की ।

हल्दीघाटी का युद्ध 1:-

5000 चुने हुए सैनिकों को लेकर मानसिंह व शक्तिसिंह शहजादे सलीम के साथ 3 अप्रैल, 1576 ई. को मंडलगढ़ जा पहुंचे | शहजादा सलीम इस सेना का सेनापति था, परन्तु आक्रमण का पूरा सेहरा मानसिंह के सर पर था | सब जानते थे की ये आक्रमण मानसिंह के पहल में ही हो रहा है | महाराणा प्रताप को जब यह पता लगा की शक्तिसिंह को साथ लेकर मानसिंह मेवाड़ पर आक्रमण के लिए चल पड़ा है, और मंडलगढ़ में रूककर एक बड़ी मुग़ल सेना का इन्तेजार कर रहा है, तो महाराणा प्रताप ने उसे मंडलगढ़ में ही दबोचने का मन बना लिया, परन्तु अपने विश्वसनीय सलाहकार रामशाह तोमर की सलाह पर राणा प्रताप ने इरादा बदल दिया | रणनीति बने गयी की मुगलों को पहल करने देनी चाहिए और उस पर कुम्भलगढ़ की पहाड़ियों से ही जवाबी हमला किया जाए |  जून के महीने में बरसात के आरम्भ में मुगल सेना ने मेवाड़ के नै राजधानी कुम्भलगढ़ के चरों ओर फैली पर्वतीय श्रृंखलाओं को घेर लिया | कुम्भलगढ़ प्रताप का सुविशाल किला था, जो की प्रताप की समस्त गतिविधियों का केंद्र था | इसी जगह प्रताप का जन्म हुआ था | मानसिंह तथा मुग़ल शहजादा ने सारी जानकारी प्राप्त कर यह रणनीति तैयार की कि प्रताप को चारो ओर से घेर कर उस तक रसद पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाए | कुम्भलगढ़ के बुर्ज से महाराणा प्रताप ने जब मुग़ल सेना और उसकी घेराबंदी का निरिक्षण किया तब वे समझ गए की राजपूतों के अग्निपरीक्षा के दिन आ गए है |

महाराणा प्रताप के पास एक भी टॉप नहीं थी पर उनका एक एक सैनिक अपना सर में कफ़न बंधकर निकला था, जान लेने और जान देने का जूनून प्रताप के हर सैनिक में था | मुग़ल सेना के निरिक्षण के बाद महाराणा प्रताप अपने प्रमुख सलाहकारों एवं सरदारों के साथ अपनी सेना के सम्मुख पहुंचे और सैनिकों को सम्भोधित करते हुए कहा –“जान लेने और जान देने का उत्सव अब हमारे सिर में है, मुग़ल सेना काले घटाओं की तरह कुमलमेर की पहाड़ियों पर छा गयी है, हमारे एक एक सैनिकों को पच्चीस पच्चीस मुग़ल सैनिकों का सर काटना है |आओ प्रतिज्ञा करें की हम एक एक सैनिकों को मुगलों के पच्चीस पच्चीस सैनिकों के सिर काटने है, हमारे जीते जी शत्रु हमारी मातृभूमि पर कदम नहीं रख सकेगा, इसके लिए चाहे हमें कोई भी कीमत चुकाने पड़े | हम इन मुग़ल सेना को बता देंगे की हम भले ही मर जाये पर युद्ध भूमि से पिछे हटना हम राजपूतों के खून में नहीं है |

इसप्रकार से महाराणा प्रताप की जोरदार आवाज से सैनिकों में प्रोत्साहन भरा जाने लगा, उनके इस बातों को सुनकर उनके सैनिकों का मनोबल आसमान की उचाईयों में पहुंचा दिया | सबने जोरदार अपने तलवारे खिंची और और बुलंद आवाज में घोषणा की कि अब ये तलवार शत्रु का रक्त पी कर ही म्यान में वापस जाएगी | दोनों ओर की सेना तैयार हो गयी परन्तु हमला नहीं हुआ, महाराणा प्रताप ने मन बना लिया था की पहले मुग़ल सेना पहल करेगी और उसके हमला करते ही हमारी सेना उनपर टूट पड़ेगी परंतू मान सिंह ने यह युद्धनिति तैयार की थी की मुग़ल सेना सीधे हमला कर पहाड़ियों के बीच में नहीं फसेंगी, वो उनको बस कुछ दिन घेरे रखेंगे ताकि उनका रसद उनतक ना पहुँच सके और महाराणा प्रताप की सेना पहाड़ियों से उतरकर खुले मैदान में आ सके जिससे उन्हें हराना ज्यादा आसान हो जाये | शहजादा इस पक्ष में था की आगे बढ़कर उनपर आक्रमण किया जाये ताकि युद्ध जल्दी ख़त्म हो सके |

हल्दीघाटी का युद्ध-2:-

शहजादे सलीम मुग़ल सेना की एक टुकड़ी आगे बढ़कर महाराणा प्रताप में आक्रमण करने का निर्देश दे दिया, मानसिंह ने उसे समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वो नहीं माना | मुगलसेना ने जैसे ही हल्दीघाटी के संकरे घाटी में प्रवेश की राणा प्रताप की सेना ने एक एक कर कई मुग़ल सेना को मौत के घाट उतार दिया क्योंकि हल्दीघाटी की प्राकृतिक बनावट कुछ इस प्रकार से थी की केवल एक बार में एक सैनिक अपने घोड़े के साथ आगे बढ़ सकती थी, परन्तु तुरंत ही सलीम ने अपने सेना को पीछे हटने का संकेत दे दिया | अब उन्हें ये समझ नहीं आ रहा था की प्रताप तक पहुँचने का कौन सा मार्ग लिया जाए, ऐसे समय में शक्तिसिंह निकलकर आया और उसने शहजादे सलीम के सामने हल्दीघाटी में सेना को प्रवेश कराने की जिम्मेदारी ली | महाराणा प्रताप ने जब ये देखा की मुग़ल सेना हल्दी घाटी के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़ रही है तो उन्हें ये समझते देर ना लगी की किसने उन्हें ये रास्ता सुझाया होगा | अब राणा प्रताप ने आगे बढ़कर हल्दीघाटी में ही मुगल सेना को दबोचने की रणनीति बनाई | राणा का आदेश पाते ही राजपूत नंगी तलवार लिए, मुग़ल सेना पर टूट पड़े | पहले ही हमले में राणा प्रताप ने मुग़ल सेना के छक्के छुड़ा दिए, देखते ही देखते मुग़ल सेना की लाशे बिछनी लगी |

अचानक से लड़ाई का रुख ही बदल गया और राजपूतों की लाशे बिछनी लगी | महाराणा ने राजपूत सैनकों की एक टुकड़ी को आदेश दिया की आगे बढ़कर उनकी तोपें छीन ली जाए, परन्तु इसके विपरीत तोप के गोले उनगे शरीर की धज्जियाँ उड़ाने लगे | ये देख कर महाराणा को बहुत दुःख हुआ, परन्तु यह एक कडवी सच्चाई थी | पूरा युद्ध क्षेत्र लाशो से पट गया था. मुग़ल सेना के तोंपो से निकले गोलों ने राजपूत सेना में कहर ढाया था | हल्दी घाटी के युद्ध में त्तिसरा दिन निर्णायक रहा, अपने जांबाज सैनिकों के लाशों के अम्बार देखकर महाराणा प्रताप बौखला गए थे |

सवानवदी सप्तमी का दिन था, आकाश में बदल भयंकर गर्जना कर रहे थे.. आज राणा प्रताप अकेले ही पूरी फ़ौज बन गए थे | दो दिन तक वो अपने परम शत्रु मानसिंह को ढूंढते रहे जो युद्ध में मुलाकात करने की धमकी दे गया था | राणा प्रताप का बहुत अरमान था की वो उससे युद्ध करे और अपना शोर्य दिखाए, परन्तु मानसिंह अपने सेना के बीचोबीच छिपा रहा | आज के युद्ध में महाराणा प्रताप ने फैसला कर लिया था की वो मानसिंह को अवश्य ढूँढ निकालेंगे | वो बहुत ही खूबसूरत सफ़ेद घोड़े चेतक में बैठे शत्रुओं का संहार करते करते मानसिंह को ढूँढने लगे | सैनिकों का सिर काटते हुए वो मुग़ल सेना के बीचो बीच जा पहुंचे, देखते ही देखते उन्होंने सैंकड़ो मुगलों की लाशे बिछा दी |

झालावाडा के राजा महाराणा प्रताप के मामा ने जब ये देखा की महाराणा प्रताप बुरी तरह से घायल हो गए है, और लगातार शत्रु से लड़े जा रहे है, तब उन्होंने अपना घोडा दौडाते हुए महाराणा प्रताप के निकट जा पहुंचे, उन्होंने झट से महाराणा का मुकुट निकला और अपने सिर में पहन लिया, फिर राणा से बोले-“तुमको मातृभूमि की सौगंध राणा अब तुम यहाँ से दूर चले जाओ, तुम्हारा जीवित रहना हम सबके लिए बहुत जरूरी है | महाराणा ने उनका विरोध किया परन्तु कई और सैनिको ने उनपर दवाब डाला की आप चले जाइये, अगर आप जीवित रहेंगे तब फिर से मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकते है, महाराणा का घोडा चेतक अत्यंत संवेदनशील था, अपने स्वामी के प्राण को संकट में देख तुरंत ही उसने महाराणा को युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया. मन्नाजी अकेले ही मुग़ल सेना के बीच घिर चुके थे, मुग़ल सेना उन्हें महाराणा समझ कर बुरी तरह से टूट पड़े, उन्होंने बहुत देर तक अपने शत्रुओं का सामना किया परन्तु अंत में वीर गति को प्राप्त किया | मन्ना जी के गिरते ही राणा प्रताप के सेना के पैर उखड़ गए |

हल्दीघाटी घाटी युद्ध के पश्चात तो बादशाह अकबर को महाराणा प्रताप के पराक्रम से इतना खौफ हो गया था की उसने अपनी राजधानी आगरा से सीधा लाहौर से विस्थापित हो गया था और फिर दुबारा महाराणा प्रताप के पश्चात ही उसने अपनी राजधानी आगरा को बनाया |

महाराणा प्रताप का प्रिय घोडा चेतक:-

महाराणा प्रताप को बचपन से घुड़सवारी करना बहुत पसंद आता था जिसके फलस्वरूप एक दिन इनके पिता के एक अफगानी सफ़ेद घोडा और दूसरा नील घोडा पसंद करने को बोलते है लेकिन दुसरे भाई की पसंद के आगे महाराणा प्रताप को नीला घोडा मिलता है जिनका नाम महाराणा प्रताप ने चेतक रखा था महाराणा प्रताप की तरह उनके घोड़े की वीरता के किस्से भी इतिहास में सुनने को मिलते है |

“रण बीच चोकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था,
राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था ||
जो तनिक हवा से बाग़ हिली लेकर सवार उड़ जाता था,
राणा की पुतली फिरी नहीं, तब तक चेतक मुड जाता था ||”

अर्थात युद्ध के चाहे कितने भी विकट परिस्थिति में महाराणा प्रताप क्यू न फसे हो लेकिन उनका प्रिय घोडा चेतक महाराणा प्रताप के जान बचाने में हमेशा सफल रहता था उसकी फुर्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था की महाराणा प्रताप के तनिक इशारे पर चेतक हवा की चाल में उड़ने लगता था और महाराणा प्रताप के पलक झपक भी नही पाती थी चेतक इतना तेज था की वह इशारे से सबकुछ समझ जाता था | हल्दीघाटी युद्ध के दौरान युद्ध में चेतक बुरी तरह घायल हो जाता है और भागते समय 21 फीट की चौडाई के नाले को पार करने के पश्चात चेतक कुछ दूर चलते ही गिर जाता है जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप बहुत ही दुखी रहते थे |

एक सच्चे राजपूत के रूप में बेहद पराक्रमी देशभक्त योद्धा के रूप में हमेसा महाराणा प्रताप का नाम आज भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है |

 

 

Maharana Pratap History in Hindi Language

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shayrana Dil © 2016 Frontier Theme