Prithviraj Chauhan history in Hindi 

Prithviraj Chauhan History in Hindi language

Prithviraj Chauhan history in Hindi: Prithviraj Chauhan was also known as Rai Pithora in the folk legends was an Indian king from the Chauhan dynasty. Prithviraj Raso is the first book on the life story of the great king Prithviraj Chauhan. He is the last Hindu king of free India. His friend Chandra Bardai wrote a book on Prithviraj Chauhan which is the epic poem. I Hope you find this post about King Prithviraj Chauhan history in Hindi. Prithviraj Chauhan was born at Ajaymeru in 1165. His father was Someshwar Chauhan and mother Karpuri Devi, she was a Kalachuri princess, and she was the daughter of Achalaraja of Tripuri. Muhammad . Delhi was to remain under Muslim rule for the next 700 years till 1857 and under British rule till 1947. There is sufficient reliable evidence about Prithviraj Chauhan.

·        पूरा नाम:- पृथ्वीराज चौहान

·        जन्मस्थान:- अजमेर

·        पिता का नाम:- राजसोमेश्वर चौहान

·        माता का नाम:- कमलादेवी

पृथ्वीराज चौहान एक महावीर पराक्रमी राजा थे। पृथ्वीराज़ चौहान अज़मेर के राजा सोमेष्वर चौहान के बेटे थे, उन्का जन्म 1165 में हुआ। उनकी गणना चौहान राज वंश के महान राजाओं में की जाती है। पृथ्वीराज चौहान एक क्षत्रिय सम्राट थे। पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमश्वर अजमेर के राजा थे। और उनकी जनेता का नाम कपूरीदेवी था। राजा सोमश्वर और कपूरी देवी को लग्न जीवन के बारह साल बाद सन्तान प्राप्ति हुई थी। पृथ्वीराज को बचपन में ही मार देने के कई बार षड्यंत्र हुए थे। सदभाग्य वश पृथ्वीराज चौहान हर वार से बच गये और बड़े हो कर एक निडर और प्रसिद्ध राजा बने। तेरह वर्ष की उर्मं  में उनके पिता की युद्ध मौत हुई, तभी से अजमेर के सिंहासन के उत्तराधिकारी बने, उनके नाना अनंगपाल ने उनकी विरता और बहादुरी के बारे में सुनने पर दिल्ली सिंहासन उन्हे सौंफ दिया।

उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कार्य कियें जिससें आज भी हर कोई प्रेरित होता है। यदि पृथ्वीराज चौहान को युगपुरुष कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।

प्रारम्भिक जीवन:-

उनके पिता की मृत्यु एक  युद्ध में  1179 में हुई  थी , इसके बाद पृथ्वीराज अजमेर और दिल्ली के राजा बने। शुरुआत में उन्होंने राजस्थान राजस्थान के राज्यो को जीतना प्रारंभ किया।  इसके बाद उन्होंने खजुराहों और महोबा पर विजय की। 1182  में उन्होंने गुजरात के चौलकय के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।  कई  साल तक  युद्ध चला पर पृथ्वीराज हार गए। उन्होंने कन्नौज पर भी कई सैनिक अभियान चलाये ताकि वो दिल्ली को अपने काबू में कर सके। उनके इस कार्य से उन्हें सफलता मिली। शाहहबुद्दीन मोहम्मद गौरी ने 1191 में पूर्वी पंजाब के भटिंडा  आक्रमण किया जोकि पृथ्वीराज चौहान के  सबसे आगे था। चौहान नें कनौज से मदद मांगी पर उन्होंने मना कर दिया।  तब  भटिंडा की तरफ बढ़ा और तराइन में अपने दुश्मन से लड़ा।  इस लड़ाई को तराइन के प्रथम युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

पृथ्वीराज की जीत हुई और मोहम्मद गौरी को बंधी बना लिया। गौरी के शमा मांगने पर उस भलाई करने वाले राजा ने उसे छोड़ दिया | मोहम्मद गौरी  छोड़ने का निर्णय गलत साबित हुआ और उसने फिर से अपनी सेना को संयोजित करना शुरू कर दिया। गौरी 1192 में 1,20,000 सैनिको की सेना लेकर आया और उसने फिर से चौहान पर आक्रमण किया जोकि तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है। गौरी जानता था कि हिन्दू सैनिको का नियम है कि वे सूर्य उदय से सूर्य अस्त के बीच में ही युद्ध करते है।  गौरी ने अपनी सेना को 5 भागो में बॉटा और सुबह के समय चौहान पर आक्रमण किया जब उनकी सेना युद्ध के लिए तैयार नई थी। राजपूत सेना परास्त हुई|

पृथ्वीराज चौहान नें किया मुहम्मद गौरी का खात्मा 

लड़ाई में मुहम्मद गौरी से परास्त होने के बाद पृथ्वीराज चौहान उसकी कैद में थे। मुहम्मद गौरी उन्हे अपने साथ ले गया था। ज़ालिम मुहम्मद गौरी नें पृथ्वीराज चौहान की दोनों आँखों को गरम सालियों से जला डाला और उन्हे अंध कर दिया था। पृथ्वीराज को मृत्यु दंड देने से पहले उनकी आखरी इच्छा पूछी गयी। पृथ्वीराज चौहान नें अपने बालपन के मित्र चंदबरदाई के माध्यम से यह बात मुहम्मद गौरी तक पहुंचवादी की पृथ्वीराज चौहान के पास “शब्द भेदी वाण” चलाने की दुर्लभ कला है।

उसने अपने दरबार में ही फौरन प्रदर्शनी का इंतजाम कराया। दरबार में पृथ्वीराज लाये गए। वहीं उनका बाल सखा चंद बरदाई भी था, उसी ने एक दोहे के माध्यम से पृथ्वीराज को संकेत दिया | दोहा कुछ इस प्रकार था –

चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ठ प्रमाणता ऊपर सुल्तान है मत चुको रे चौहान इस संकेत के को पाते ही पृथ्वीराज चौहान नें उस जगह पर सटीक शब्द भेदी वाण चला दिया जहां पर मोहम्मद गौरी मौजूद था। मुहम्मद गौरी वहीं दम तोड़ देता है।

पृथ्वीराज और उनका परम मित्र चंद बरदाई, उसके बाद एक दूजे को मार देते हैं ताकि मुहम्मद गौरी के सिपाहियों के हाथ आने पर उनकी और दुर्गति ना हो। अपने पति पृथ्वीराज की मृत्यु की खबर पाते ही संयोगिता भी सती हो कर अपना देह त्याग देती है।

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता का अमर प्रेम :-

 

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास

 

कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों पर सुनेहरे अक्षरों में लिखी गयी है। पृथ्वीराज और संयोगिता पहेली बार एक दूजे को देखते ही, प्रेम की डोरी से बंध गए थे। जयचंद और पृथ्वीराज में शत्रुता होने के कारण उनका मिलन इतना सहज नहीं था। पृथ्वीराज के मन में संयोगिता को पाने की इच्छा बढ़ती ही जा रही थी, ब्राह्मणों ने पृथ्वीराज को ये खबर दे दी की संयोगिता को जयचंद ने गंगा किनारे किसी महल में कैद कर रखा है | पृथ्वीराज ने अपने मित्र चंदरबरदाई को कन्नोज की राजधानी राठौर चलने का आग्रह किया, कवि चन्द्र ने उन्हें बहुत समझाना चाहा की जयचंद बहुत ही बलवान राजा है, उसने थोड़े से ही सेना के साथ दिल्ली नगरी के सैंकड़ो गावों को जला दिया और लूट लिया था उसने कई तरह से आपकी प्रजा को कष्ट पहुंचाया अतः आपका वहां जाना किसी भी तरह से उचित नहीं है |

Prithviraj Chauhan history in Hindi

इतना समझाने पर भी पृथ्वीराज ने कवी चन्द्र की एक ना मानी, अंत में लाचार होकर उन्हें पृथ्वीराज के साथ ही जाना पड़ा. इसके कुछ दिन बाद एक शुभ मुह्रुत देखकर पृथ्वीराज, चंदरबरदाई और अपने कुछ सामंतों के साथ वो भेष बदलकर कन्नोज की ओर चल दिए उनके साथ कुछ थोड़ी सेना भी थी |

जयचंद के पास तीन लाख घुड़ सवार, एक लाख हाथी और दस लाख पैदल सेना थी जो की भारतवर्ष की एक बहुत ही शक्तिशाली राज्य थी | कवि चन्द्र पृथ्वीराज को लिए जयचंद्र के द्वार के फाटक पर पहुँच गए, जयचंद्र के पास कवी चन्द्र के आने की खबर पहुंची, जयचंद्र चंदरबरदाई के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जयचन्द्र वीरों और कवियों की सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ता था इस लिए वो अपने दरबार के कुछ कवियों को कवी चन्द्र के पास भेज कर पहले उनकी परीक्षा करवाई और फिर दरबार में बुला लिया |

दरबार में कवी चन्द्र ने जयचंद्र के पूछे हुए कितने ही सवालों का जवाब दिया | चन्द्रबरदाई ने कहा –

जहाँ वंश छतीस आवे हुंकारे,

तहां एक चहूवान पृथ्वीराज टारे”

 

कवि चन्द्र के ये अंतिम पद जयचंद्र के ह्रदय में तीर सा जा चुभे उसके नेत्र लाल हो गए. वह भयानक रूप से क्रोधित हो उठा, कवि चन्द्र ने पृथ्वीराज की प्रसंसा में इतने जोरदार सब्द कहे थे की वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध होकर कवी चन्द्र और जयचंद को देखने लगे थे | जयचंद इर्श्यन्वित हो उठा उसके छाती में सांप लोटने लगे उसने एक लम्बी ठंडी सांस भरी और कहा- “पृथ्वीराज अगर मेरे सामने आये तो बताऊँ” पृथ्वीराज चन्द्रबरदाई के सेवक के रूप में पहले से ही पीछे खड़े थे, जयचंद की बातें सुनकर पृथ्वीराज भी बहुत क्रोधित हो उठे यद्यपि उन्होंने अपने आप को उस समय बहुत संभाला लेकिन उनके नेत्रों का रंग ही गुस्से से बदल गया, जयचंद ये देखकर मन ही मन संदेह करने लगा की कहीं ये ही तो पृथ्वीराज नहीं, लेकिन फिर सोचा पृथ्वीराज जैसा तेजस्वी पुरुष चन्द्रबरदाई का सेवक बन कर यहाँ क्यों आएगा, इस भ्रम में वो कुछ नहीं कहा |

जयचंद क्रोध से अपने मंत्री से कहने लगा की हमें पृथ्वीराज को पकड़ कर मार डालना चाहिए इससे संयोगिता की आश भी टूट जायगी और मेरा अपमान का बदला भी पूरा हो जायेगा | राजमंत्री सुमंत ने कहा की इतने बड़े प्रतापी राजा को पकड़ कर मारना कदापि संभव नहीं है और पृथ्वीराज यहाँ चंदरबरदाई के साथ क्यों आयेंगे | इस विषय में आपको चंदरबरदाई से ही सीधे सीधे पुच लेना चाहिए | वो कदापि झूठ नहीं बोलेंगे |

जयचंद को अपनी मंत्री की बात अच्छी लगी क्योंकि उन्हें मालूम था की चंदरबरदाई कभी झूठ नहीं बोलते है | अतः उन्होंने चंदरबरदाई को बहुत ही आदर के साथ बुलाकर पुछा की क्या पृथ्वीराज तुम्हारे साथ है, चंदरबरदाई ने इसका जवाब बहुत ही खूबसूरती से अपनी ओजस्वनी भाषा में पृथ्वीराज की कृती कथा का वर्णन करते हुए कह दिया की वे अभी कन्नोज में ही है उनके साथ ग्यारह लाख योद्धाओं को मार गिराने वाले ग्यारह सौ सैनिक और सामंत भी है | इतना सुनते ही जयचंद ने कवी चन्द्र को विदा किया और मंत्री सुमंत को अपनी सेना को तैयार करने का आदेश दे दिया |

पृथ्वीराज और संयोगिता का मिलन:-

जयचंद के सैनिकों ने तुरंत ही पृथ्वीराज के निवास स्थल को घेरने के लिए चल पड़ी जैसे ही ये बात पृथ्वीराज के एक सामंत लाखिराय को मिली वो तुरंत ही उनसे युद्ध करने के लिए अग्रसर हो गए | उन्होंने बहुत ही वीरता से युद्ध किया इस युद्ध में पृथ्वीराज का सामंत लाखिराय मारा गया और जयचंद का मंत्री सुमंत और सह्समल समेत कई सामंत भी मारा गया | युद्ध आरम्भ हो गया, इसबार पृथ्वीराज ने अपने सेना का भार पंगुराय को देकर स्वयं पृथ्वीराज ने संयोगिता को लाने के लिए चले गए | जयचंद्र के लगभग दो हज़ार योद्धा मारे गए, पृथ्वीराज के भी कई सामंत और सैनिक मारे गए |

संयोगिता ने सभी से सलाहकार पृथ्वीराज को महल में बुला लिया और यहीं पर उन्होंने गंधर्व विवाह किया | अब वहां से घर जाने का समय हो गया था क्योंकि उन्हें मालूम था की उनके सामंत अभी भी युद्ध कर रहे थे, घर जाने के नाम से ही संयोगिता व्याकुल हो उठी और विलाप करने लगी, उनकी दशा बहुत ही दींन हो गयी | गुरुराम ने पृथ्वीराज को कहा की अआप तो यहाँ श्रींगाररस में डूबे हुए है परन्तु क्या आपको पता है की लक्खिराय,इंदरमन,कुरंग, दुर्जनराय, सलाख सिंह,भीम राय, और न जाने कितने ही सामंत मारे जा चुके है, इतना कहकर उन्होंने कान्हा को दिया पत्र उनके हाथों में थमा दिया, पत्र पढ़कर पृथ्वीराज वहां से चल दिए |

धीरे धीरे रात गहरी हुई और युद्ध थम गया | सब सामंतों ने संयोगिता समेत पृथ्वीराज को बीच में किया और बैठकर धीरे धीरे ये विचारने लगे की आगे क्या करना है | पृथ्वीराज उन्हें देखकर अपने आप को रोक नहीं पाए और और जिस जगह में लाश रखी थी उस जगह जाकर उनसे लिपट लिपट कर रोने लगे और अपना माथा पटकने लगे। पृथ्वीराज की दुर्गति देखकर सारा माहोल शोक में डूब गया, पृथ्वीराज का रो रो कर जब बहुत ही बुरा हाल हो गया तब चन्द्रबरदाई ने उन्हें समझाने को कोशिश की कि जो होना था वो तो हो गया अब आगे के लिए क्या विचार है.सभी सामंतों ने ये विचार किया की अभी जैसे बन पड़े महाराज को बेदाग़ दिल्ली पहुंचा देना चाहिए,इसके बाद हम दुश्मन के सेना को समझ लेंगे अगर हम सबको भी वीरगति को प्राप्त करना पड़े तो कोई बात नहीं सीधे स्वर्ग पहुंचेंगे |

Prithviraj Chauhan history in Hindi

अब सामंत उन्हें समझाने लगे की आप संयोगिता को लेकर रात्रि के अँधेरे में निकल जाए, सभी सामंत पृथ्वीराज को समझा कर थक गए पर वो एक न माने, उनके सामंत जितना समझाते वो उतना ही उनपर बिगड़ते | कन्नोज सेना पृथ्वीराज को पकड़ना चाहती और सभी सामंतगण उनकी रक्षा किये जा रहे थे | पृथ्वीराज की सेना एक घेरा बनाये हुए दिल्ली की ओर चली जा रही थी, जयचंद की सेना बराबर उनके पीछा करती जा रही थी, इस तरह से युद्ध करते करते कान्हा भी वीरगति को प्राप्त किया | इस युद्ध में पृथ्वीराज के चौसठ सामंत वीरगति को प्राप्त किये | और बहुत ही कठिनता से दिल्ली पहुँच गए | इसप्रकार से पृथ्वीराज अपने राज्य की इतने मजबूत स्तंभों को गंवाकर संयोगिता का हरण किया |

पृथ्वीराज चौहान की म्रत्यु:-

 

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास

 

भारत की भूमि पर अनेक योद्धाओं और महायोद्धाओं ने जन्म लिया है। अपने दुश्मन को धूल चटाकर विजयश्री हासिल करने वाले इन योद्धाओं ने कभी अपने प्राणों की परवाह नहीं की। हमारे इतिहास ने इन योद्धाओं को वीरगति से नवाजा, सदियां बीतने के बाद आज भी इन्हें शूरवीर ही माना जाता है लेकिन इन वीरों की निजी जिन्दगी कितनी मार्मिक और भावनाओं से भरी थी, इस पर शायद कभी विचार नहीं किया गया।

एक अच्छा योद्धा, एक बेहतरीन दोस्त या प्रेमी भी हो सकता है, इस एंगल से कभी सोचा नहीं गया। आज हम आपको पृथ्वीराज चौहान की एक ऐसी कहानी सुनाएंगे जो उन्हें एक अचूक निशानेबाज तो दर्शाती ही है लेकिन एक सख्त देह के भीतर एक कोमल दोस्त और प्रेमी भी छिपा होता है, यह भी बताती है।

बात उन दिनों की है जब अपने नाना की गद्दी संभालने के लिए पृथ्वीराज ने दिल्ली का शासन संभाला था। दरअसल दिल्ली के पूर्व शासक अनंगपाल का कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद और अजमेर के महाराज सोमेश्वर चौहान से यह अनुरोध किया कि वह अपने पुत्र पृथ्वीराज को दिल्ली की सत्ता संभालने दें। सोमेश्वर चौहान ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के शासक बन गए। एक तरफ जहां पृथ्वीराज दिल्ली की सत्ता संभाल रहे थे वहीं दूसरी ओर कन्नौज के शासक जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता के स्वयंवर की घोषणा कर दी। जयचंद, पृथ्वीराज के गौरव और उनकी आन से ईर्ष्या रखता था इसलिए उसने इस स्वयंवर में पृथ्वीराज को निमंत्रण नहीं भेजा। इसी दौरान कन्नौज में एक चित्रकार, बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से चित्र लेकर आया। पृथ्वीराज चौहान का चित्र देखकर सभी स्त्रियां उनके आकर्षण की वशीभूत हो गईं। जब संयोगिता ने पृथ्वीराज का यह चित्र देखा तब उसने मन ही मन यह वचन ले लिया कि वह पृथ्वीराज को ही अपना वर चुनेंगी।

वह चित्रकार जब दिल्ली गया तब वह संयोगिता का चित्र भी अपने साथ ले गया था। संयोगिता की खूबसूरती ने पृथ्वीराज चौहान को भी मोहित कर दिया। दोनों ने ही एक-दूसरे से विवाह करने की ठान ली। पृथ्वीराज को भले ही निमंत्रण ना भेजा गया हो लेकिन उन्होंने उसमें शामिल होने का निश्चय कर लिया था।
पृथ्वीराज का अपमान करने के उद्देश्य से जयचंद ने उन्हें स्वयंवर में तो आमंत्रित नहीं किया, लेकिन मुख्य द्वार पर उनकी मूर्ति को ऐसे लगवा दिया जैसे कोई द्वारपाल खड़ा हो। स्वयंवर के दिन जब महल में देश के कोने-कोने से आए राजकुमार उपस्थित थे तब संयोगिता को कहीं भी पृथ्वीराज नजर नहीं आए। इसलिए वह द्वारपाल की भांति खड़ी पृथ्वीराज की मूर्ति को ही वरमाला पहनाने आगे बढ़ी। जैसे ही संयोगिता ने वरमाला मूर्ति को डालनी चाहे वैसे ही यकायक मूर्ति के स्थान पर पृथ्वीराज चौहान आ खड़े हुए और माला पृथ्वीराज के गले में चली गई।

अपनी पुत्री की इस हरकत से क्षुब्ध जयचंद, संयोगिता को मारने के लिए आगे बढ़ा लेकिन इससे पहले की जयचंद कुछ कर पाता पृथ्वीराज, संयोगिता को लेकर भाग गए। लेकिन उनका प्रेम उनके लिए सबसे बड़ी गलती बन गया। इधर संयोगिता और पृथ्वीराज खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे, वहीं जयचंद मोहम्मद गोरी के साथ मिलकर पृथ्वीराज को मारने की योजना बनाने लगा।

Prithviraj Chauhan history in Hindi

पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को 16 बार धूल चटाई थी लेकिन हर बार उसे जीवित छोड़ दिया। जयचंद ने अपना सैनिक बल पृथ्वीराज चौहान को सौंप दिया, जिसके फलस्वरूप युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को बंधक बना लिया गया। बंधक बनाते ही मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान की आंखों को गर्म सलाखों से जला दिया और कई अमानवीय यातनाएं भी दी गईं। अंतत: मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को मारने का फैसला कर लिया इससे पहले कि मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज को मार पाता, पृथ्वीराज के करीबी दोस्त और राजकवि चंद्रवरदाई ने गोरी को पृथ्वीराज की एक खूबी बताई। दरअसल पृथ्वीराज चौहान, शब्दभेदी बाण चलाने के उस्ताद थे। वह आवाज सुनकर तीर चला सकते थे। गोरी ने पृथ्वीराज को अपनी यह कला दिखाने का आदेश दिया।

प्रदर्शन आरंभ करने का आदेश देते ही पृथ्वीराज ने समझ लिया कि गोरी कितनी दूरी और किस दिशा में बैठा है। उनकी सहायता करने के लिए चंद्रवरदाई ने भी दोहों की सहायता से पृथ्वीराज को गोरी की बैठकी समझाई। पृथ्वीराज ने बाण चलाया जिससे मोहम्मद गोरी धाराशायी हो गया। कहते हैं दुश्मन के हाथ से मरने से अच्छा है किसी अपने के हाथ से मरा जाए। बस यही सोचकर चंद्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर अपनी दोस्ती का बेहतरीन नमूना पेश किया। जब संयोगिता को इस बात की खबर मिली तब वह भी एक वीरांगना की तरह सती हो गई। 1192 में पृथ्वीराज का भी निधन हो गया।

 

History of Alexander The Great

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shayrana Dil © 2016 Frontier Theme