Raksha Bandhan Poem in Hindi

Raksha Bandhan Poem in Hindi

प्यारे भैया आपके लिए  राखी मँगवाकर रखी हूँ 

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Raksha Bandhan Poem

प्यारे भैया, दो पल को ही मेरे घर तुम आ जाना,
माँ बाबा का हाल है कैसा, आकर जरा बता जाना,
आँगन मेरा महक उठेगा, मायके की मिट्टी पाकर,
घर मेँ माँ बाबा को सुनाना, मेरी ये चिट्ठी जाकर…!!

आओगे जब मिलने मुझसे, माँ का संदेशा ले आना,
बाबा का दुलार भी मुझको, आकर तुम ही दे जाना,
भैया मैँने प्यारी सी एक, राखी मँगवाकर रखी है,
अब के बरस तुम आओगे, ये आस लगाकर रखी है…!!

प्यारे भैया, पता है मुझको काम बहुत ही ज्यादा है,
लेकिन राखी पर आने का, मुझसे भी किया इक वादा है,
अब के बरस भी पलकेँ बिछाए, बाट तुम्हारी देखूंगी,
हाथोँ मेँ इक थाल सजाए, दरवाजे पर बैठूंगी…!!

वादा करो कि अबकी बार, राखी पर तुम आओगे,
साथ मेँ अपने मेरी प्यारी, भाभी को भी लाओगे,
धन दौलत की चाह नहीँ है, न हीरे जवाहरात की,
आँखेँ मेरी प्यासी हैँ, बस तुमसे मुलाकात की…!!

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सबसे प्यारे भैया मेरे

Raksha Bandhan Poem in Hindi

अच्छे भैया मेरे सबसे प्यारे भैया मेरे
तुम हो मेरे रखवाले मुझसे ये राखी बन्धवाले
तेरे साथ मैं चलूँगी मेरे साथ तुम चलना
तेरी रक्षा मैं करुगी मेरी रक्षा तुम करना,

राखी का ये बंधन प्यारा इस बंधन को बांधे रखना
टूटे ना रिश्तो का धागा मजबूत अपने इरादे रखना
जब मैं तुमसे रूठ जाऊं तो तुम मुझे मनाना
जब-जब मैं रोऊँ तुम मुझे हंसाना,

मेरे भैया दूर ना जाना मुझसे तुम राखी बंधवाना
प्यारे प्यारे भैया मेरे सबसे अच्छे भैया मेरे…!!

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प्रीत के धागो के बंधन में,
स्नेह का उमड़ रहा संसार,
सारे जग में सबसे सच्चा,
होता भाई बहन का प्यार,
नन्हे भैया का है कहना,
राखी बांधो प्यारी बहना..

सावन की मस्तीली फुहार,
मधुरिम संगीत सुनती है,
मेघों की ढोल ताप पर,
वसुंधरा मुस्काती है…

आया सावन का महीना,
राखी बांधो प्यारी बहना.

धरती ने चाँद मामा को.
इंद्रधनुषी राखी पहनाई,
बिजली चमकी खुशियों से,
रिमझिम जी ने झड़ी लगाई..

राजी ख़ुशी सदा तुम रहना,
राखी बाँधों प्यारी बहना..!!

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Raksha Bandhan Poem in Hindi

Raksha Bandhan Poem in Hindi

राखी आई खुशियाँ लाई
बहन आज फूली ना समाई
राखी, रोली और मिठाई
इन सब से थाली खूब सजाई

बाँधे भाई की कलाई पे धागा
भाई से लेती है यह वादा
राखी की लाज भैया निभाना
बहना को कभी भूल ना जाना

भाई देता बहन को वचन
दुःख उसके सब कर लोग हरण
भाई बहन को प्यारा है
राखी का त्यौहार सबसे न्यारा है..!!

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हर सावन में आती राखी,
बहना से मिलवाती राखी…

चाँद सितारों की चमकीली,
कलाई को कर जाती राखी…

जो भूले से भी ना भूले,
मनभावन क्षण लाती राखी,
अटूट-प्रेम का भाव धागे से
हर घर में बिखराती राखी…

सारे जग की मूल्यवान
चीजों से बढकर भाती राखी.

सदा बहन की रक्षा करना,
भाई को बतलाती राखी..!!

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चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी ।
सुनहरी, सब्ज़, रेशम, ज़र्द और गुलनार की राखी ।
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी ।
सलूनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी ।
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी

अयाँ है अब तो राखी भी, चमन भी, गुल भी, शबनम भी ।
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी ।
तमाशा है अहा ! हा ! हा गनीमत है यह आलम भी ।
उठाना हाथ, प्यारे वाह वा टुक देख लें हम भी ।
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी

मची है हर तरफ़ क्या क्या सलूनों की बहार अब तो ।
हर एक गुलरू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो ।
हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह में तुमको ।
यही आता है जी में बनके बाम्हन आज तो यारो ।
मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी

हुई है ज़ेबो ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से ।
व लेकिन तुमसे अब जान और कुछ राखी के गुल फूले ।
दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके ।
तुम्हारे हाथ ने मेंहदी ने अंगश्तो ने नाख़ुन ने ।
गुलिस्ताँ की, चमन की, बाग़ की गुलज़ार की राखी

अदा से हाथ उठने में गुले राखी जो हिलते हैं ।
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं ।
कहाँ नाज़ुक यह पहुँचे और कहाँ यह रंग मिलते हैं ।
चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं ।
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़ गुल रुख़सार की राखी

फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के मारे ।
तो उनकी राखियों को देख ऐ ! जाँ ! चाव के मारे ।
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ः लगा माथे ऊपर बारे ।
’नज़ीर’ आया है बाम्हन बनके राखी बाँधने प्यारे ।
बँधा लो उससे तुम हँसकर अब इस त्यौहार की राखी..!!

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वह मरा कश्मीर के हिम-शिखर पर जाकर सिपाही,
बिस्तरे की लाश तेरा और उसका साम्य क्या?
पीढ़ियों पर पीढ़ियाँ उठ आज उसका गान करतीं,
घाटियों पगडंडियों से निज नई पहचान करतीं,
खाइयाँ हैं, खंदकें हैं, जोर है, बल है भुजा में,
पाँव हैं मेरे, नई राहें बनाते जा रहे हैं।
यह पताका है,
उलझती है, सुलझती जा रही है,
जिन्दगी है यह,
कि अपना मार्ग आप बना रही है।
मौत लेकर मुट्ठियों में, राक्षसों पर टूटता हूँ,
मैं, स्वयं मैं, आज यमुना की सलोनी बाँसुरी हूँ,
पीढ़ियाँ मेरी भुजाओं कर रहीं विश्राम साथी,
कृषक मेरे भुज-बलों पर कर रहे हैं काम साथी,
कारखाने चल रहे हैं रक्षिणी मेरी भुजा है,
कला-संस्कृति-रक्षिता, लड़ती हुई मेरी भुजा है।
उठो बहिना,
आज राखी बाँध दो श्रृंगार कर दो,
उठो तलवारों,
कि राखी बँध गई झंकार कर दो..!!

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राखी बांधत जसोदा मैया ।
विविध सिंगार किये पटभूषण, पुनि पुनि लेत बलैया ॥
हाथन लीये थार मुदित मन, कुमकुम अक्षत मांझ धरैया।
तिलक करत आरती उतारत अति हरख हरख मन भैया ॥
बदन चूमि चुचकारत अतिहि भरि भरि धरे पकवान मिठैया ।
नाना भांत भोग आगे धर, कहत लेहु दोउ मैया॥
नरनारी सब आय मिली तहां निरखत नंद ललैया ।
सूरदास गिरिधर चिर जीयो गोकुल बजत बधैया..!!

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जाति-धर्म के तोड़ता बंधन, फिर भी सबको है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता।।

प्राणवायु नहीं दिखती फिर भी, जीवन उसी से है चलता।
बहन हो कितने दूर भी, फिर भी राज उसी का है चलता।।

जंजीरें भी जकड़ न पाएं, मन इतना चंचल होता।
पल में अवनि, पल में अंबर, पल में सागर में खोता।।

इतने चंचल मन को बांधा, इक रेशम के धागे ने,
हंसते-हंसते खुद बंध जाना, सबके मन को है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता..!!

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दीदी जब सावन में,
काली मिट्टी पर उग आए,
हरे पौधों को देखता हूँ,
तो मेरी साँवली कलाई पर,
हरे रंग का रेशम,
खुद ब खुद,
उग आता है,
मैं अपने माथे पर,
सुर्ख रोली ढूँढता हूँ,
और,
जब सहर आसमाँ के माथे पर,
वही लाल रोली मलती है,
तो हल्का-सा टीका मुझे भी,
लगा जाती है!!

बरसात जब बूँदों का अक्षत,
मेरे सर पर छिड़कती है,
तो मैं होश में आता हूँ,
और,
सूनी कलाई, सूनी दुनिया,
सूना माथा पाता हूँ!!
दीदी, कभी भोर, कभी मिट्टी,
कभी बारिश बन कर आओ,
शायद मैं अकेला हूँ,
मुझे साथ ले जाओ..!!

Raksha Bandhan Poem in Hindi

Raksha Bandhan Poem in Hindi
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कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है राखी,
प्यार और मीठी शरारतो की होड़ है राखी।
भाई की लम्बी उम्र की दुआ राखी,
बहन के प्यार का पवित्र धुँआ है राखी..!!
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भाई से बहन की रक्षा का वादा है राखी,
लोहे से भी मज़बूत एक धागा है राखी।
जात-पात और भेदभाव से दूर है राखी,
एकता का पाठ पढ़ाती नूर है राखी।

बचपन की यादों का चित्रहार है राखी,
हर घर में खुशियों का उपहार है राखी।
रिश्तों के मीठेपन का एहसास है राखी,
भाई-बहन का परस्पर प्यार है राखी।

दिल का सकून और मीठा सा जज़्बात है राखी,
शब्दों की नहीं पवित्र दिलो की बात है राखी..!!

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भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज ।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज..!!
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लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ ।
भरत – भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ..!!

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वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान ।
पढ़ते – पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान..!!
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मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवायी ।
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी – बन्द – शत्रु – भाई..!!

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किन्तु देखना है, यह मेरी
राखी क्या दिखलाती है ।
क्या निस्तेज कलाई पर ही
बँधकर यह रह जाती है..!!

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देखो भैया, भेज रही हूँ
तुमको-तुमको राखी आज ।
साखी राजस्थान बनाकर
रख लेना राखी की लाल..!!

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हाथ काँपता, हृदय धड़कता
है मेरी भारी आवाज ।
अब भी चौक-चौक उठता है
जलियाँ का वह गोलन्दाज..!!

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यम की सूरत उन पतितों का
पाप भूल जाऊँ कैसे?
अंकित आज हृदय में है
फिर मन को समझाऊँ कैसे..!!

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बहिने कई सिसकती हैं हा ।
सिसक न उनकी मिट पायी ।
लाज गँवायी, गाली पाई
तिस पर गोली भी खायी..!!

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डर है कही न मार्शल-ला का
फिर से पड़ जावे घेरा ।
ऐसे समय द्रौपदी-जैसा
कृष्ण ! सहारा है तेरा..!!

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बोलो, सोच-समझकर बोलो,
क्या राखी बँधवाओगे
भीर पडेगी, क्या तुम रक्षा-
करने दौड़े आओगे..!!

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यदि हाँ तो यह लो मेरी
इस राखी को स्वीकार करो ।
आकर भैया, बहिन ‘सुभद्रा’–
के कष्टों का भार हरो..!!

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Updated: October 28, 2017 — 1:12 pm

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