Rani Laxmi Bai Biography In Hindi 

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi

Rani Lakshmi Bai Essay in Hindi: Lakshmi Bai is the Rani of Jhansi was the queen of the princely state of Jhansi in North India. Here is given the biography of the well-known freedom fighter Rani Lakshmi Bai. Check out the history of Rani Laxmi Bai. Rani Lakshmibai was the famed monarch of Jhansi and an embodiment of courage at the time of British reign in India. Rani Laxmi Bai was the great heroine of the First War of Indian Freedom. She became a widow at the tender age of 18 and lived only until 22 yet November 19, 1835, Kashi, India died June 17, 1858, Kotah-ki-Serai, near Gwalior), queen of Jhansi and a leader of the Indian Mutiny of 1857–58. Brought up in the household of the Peshwa (ruler) Baji Rao II, Lakshmi Bai had an unusual upbringing for a Brahman girl. Rani Lakshmi Bai of Jhansi is known as “India’s Joan of Arc”. This young lady, who was still in her twenties, was the widow of Gangadhar Rao, Rani Laxmibai is one of the most well-known woman warriors in the history of India. She was a brave, courageous and has inspired Often called India’s Joan Of Arc, Rani Lakshmi Bai, the queen of Jhansi, Colonel Malleson wrote in the ‘History Of The Indian Mutiny’ vol. Thus she became the queen of Jhansi and was called Maharani Laxmi Bai. she became an icon in the national history as a symbol of patriotism. Samadhi of Rani Lakshmi Bai, Gwalior. The Brave Rani of Jhansi. “Khub Ladi Mardani Wo to Jhansi wali Rani Thi“. We all have heard about the brave Laxmibai, Rani of Jhansi. This is the biography of the famous Indian queen Rani Lakshmibai where is leadership qualities of Rani Laxmi Bai. Her early life Lakshmibai was born in Varanasi, to a Maharashtrian Brahmin named Moropant Tambe and his wife Bhagirathi Bai.

 

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi 

Rani Lakshmi Bai Essay in Hindi

रानी लक्ष्मीबाई का जग 18 नवम्बर, 1835 ईo को वाराणसी में हुआ था | रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी थीं और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकुमत के विरुद्ध बिगुल बजाने वाले वीरों में से एक थीं। वे ऐसी वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से मोर्चा लिया और रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हो गयीं परन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपने राज्य झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

  • पूरा नाम:- राणी लक्ष्मीबाई गंगाधरराव
  • जन्म:- 19 नवम्बर, 1835
  • जन्मस्थान:- वाराणसी
  • पिता का नाम:- श्री. मोरोपन्त
  • माता का नाम:- भागीरथी
  • शिक्षा:- मल्लविद्या, घुसडवारी और शत्रविद्याए सीखी
  • विवाह:- राजा गंगाधरराव के साथ
  • प्रसिद्धि का कारण:- भारतीय स्वतंत्रता सेनानी

प्रारंभिक जीवन:-

लक्ष्मीबाई को बचपन में सब प्यार से मनु बुलाते थे | मनु के पिता पुणे के पेशवा बाजीराव के दरबार में थे | मनु की आयु चार – पांच वर्ष की थी कि उनकी माँ का देहांत हो गया | माँ के निधन के बाद घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गये।मनु की देखभाल के लिए उनके पिता उन्हें अपने साथ पेशवा बाजीराव के दरबार में ले जाते थे | अतः मनु का बचपन पेशवा बाजीराव के पुत्रो के साथ बीता| मनु उन्ही के साथ पढ़ती थी |

सन 1842 में मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और इस प्रकार वे झाँसी की रानी बन गयीं और उनका नाम बदलकर लक्ष्मीबाई कर दिया गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई और गंगाधर राव को पुत्र रत्न की पारपत हुई पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। उधर गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। उन्होंने वैसा ही किया और पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को गंगाधर राव परलोक सिधार गए। उनके दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

रानी लक्ष्मीबाई का विवाह:-

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi 

मन्नू जब कुछ बड़ी हुई तो इनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधरराव से कर दिया गया । विवाह के बाद मन्नू लक्ष्मीबाई के नाम से जनि गई | कुछ समय पश्चात लक्ष्मीबाई के घर एक पुत्र ने जन्म’ लिया । परन्तु कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई । उसके पश्चात गंगाधरराव भी बीमार रहने लगे तथा उनकी म्रत्यु हो गई । रानी ने एक बच्चा गोद लेने की सोची । उस समय बच्चा गोद लेने से पहले ब्रिटिश सरकार से मान्यता लेनी पड़ती थी । उन्होंने झांसी को पुत्र गोद लेने को मान्यता नहीं दी, तथा झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाने का ऐलान कर दिशा जिस कारण रानी में अंग्रेजों के प्रति पूणा एवं रोष की’ ज्वाला सुलगने लगी | रानी ने अंग्रेजों पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना तैयार की जिसका परिणाम भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सन् 1857 ई. में हुआ। यह चिंगारी मेरठ से प्रारंभ हुई थी तथा फैलती हुई दिल्ली तथा लखनऊ तक पहुंची। अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया।

Rani Lakshmi Bai Essay in Hindi

लक्ष्मीबाई ने भी उनका जवाब डटकर दिया परन्तु झांसी के कुछ गद्‌दार अंग्रेजों के साथ जा मिले थे जिस कारण झांसी को हार का सामना करना पड़ा। रानी ने कालपी जाकर पेशवा से मिल जाने का निश्चय किया । जब वे कालपी जा रहीं थीं तो अंग्रेजों को इसकी खबर लग गई। उन्होंने रानी का पीछा किया तथा घमासान युद्ध हुआ । रानी उनका सामना करती रही तथा किसी तरह कालपी पहुंच गई। कालपी के राजा ने रानी की सहायता अपनी सेना देकर की। उस सेना के सहयोग से रानी ने अंग्रेजों पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी रानी को असफलता ही प्राप्त हुई । रानी सहायता के लिए ग्वालियर नरेश के पास अपनी सेना सहित पहुंची। गवालियर ने महारानी तथा उसकी सेना पर गोलाबारी शुरू कर दी । रानी की सेना ने अपनी बहादुरी से ग्वालियर के किले पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया परन्तु अंग्रेजों ने रानी का पीछा यहां भी नहीं छोड़ा । उन्होंने ग्वालियर के किले को घेर लिया । रानी ने उनका डटकर सामना किया । दोनों हाथों से तलवार से वार करती हुई, मुंह में घोड़े की लगाम लेकर अंग्रेजों को चीरती काटती आगे बढ़ती गई । रानी ने बड़ी वीरता से अंग्रेजों के वार का जवाब दिया और वह लड़ती-लड़ती वीरगति को प्राप्त हो गई । उन्होंने अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके । मृत्युपर्यन्त वह अंग्रेजों का डटकर मुकाबला करती रही ।

अंग्रेजो की राज्य हड़प नीति और झाँसी:-

ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने बालक दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ नीति के तहत झाँसी राज्य का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला कर लिया। लक्ष्मीबाई ने अँगरेज़ वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया पर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कोई फैसला हो ही नहीं सकता था इसलिए बहुत बहस के बाद इसे खारिज कर दिया गया। अंग्रेजों ने झाँसी राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगादाहर राव के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का हुक्म दे दिया। अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को झाँसी का किला छोड़ने को कहा जिसके बाद उन्हें रानीमहल में जाना पड़ा। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झाँसी की रक्षा करने का निश्चय किया।

परिणाम:-

इस सिद्धान्त का अधिकार क्षेत्र आश्रित हिन्दू राज्यों तक सीमित था, इस कारण इन विलयों से इन राज्यों के राजाओं और उनके अभिजात वर्ग में आशंका और रोष पैदा हो गया। आमतौर पर माना जाता है, कि 1857 के भारतीय बगावत के शुरू होने और फैलाने के पीछे जो असंतोष था, उसे भड़काने में इस सिद्धान्त का भी योगदान था।

अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष:-

अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भी भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। झाँसी की आम जनता ने भी इस संग्राम में रानी का साथ दिया। लक्ष्मीबाई की हमशक्ल झलकारी बाई को सेना में प्रमुख स्थान दिया गया। सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं। तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया।

झाँसी का युद्ध:-

झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारीबाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया।

1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़बज़ा कर लिया। रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्याटोपे से मिली।

रानी के जीवन में उतारचढाव:-

रानी के जीवन में बहुत से उतार – चढाव आये | रानी को एक पुत्र उत्पन्न हुआ परन्तु यह आनंद अल्पकाल तक ही रहा कुछ महीनो बाद ही शिशु की मृत्यु हो गयी | जब राजा गंगाधर राव गंभीर रूप से बीमार हुए तो दुर्भाग्य के बादल और भी घने हो गये | उनके जीवित बचने की कोई आशा नहीं थी दरबार के लोगो की सलाह पर उन्होंने अपने परिवार के पांच वर्षीय बालक को गोद लेकर दत्तक पुत्र बना लिया |

बालक का नाम दामोदर राव रखा गया | बालक को गोद लेने के दुसरे दिन ही राजा की मृत्यु हो गयी | रानी पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा | इस विपत्ति के समय झाँसी राज्य को कमजोर समझकर अंग्रेजो ने अपनी कूटनीतिक चाल चली |

अंग्रेजो की मानसिकता को महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने बहुत सुन्दर ढंग से लिखा है-

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया ,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया ..!!
फौरन फौजे भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया ,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया..!!

अंग्रेजो ने रानी को पत्र लिखा कि राजा के कोई न होने के कारण झाँसी पर अब अंग्रेजो का अधिकार होगा | इस सूचना पर रानी तिलमिला उठी | उन्होंने घोषणा की कि झाँसी का स्वतंत्र अस्तित्व है | स्वामिभक्त प्रजा ने भी उनके स्वर में स्वर मिला कर कहा हम अपनी झाँसी नहीं देंगे | अंग्रेजो ने झाँसी पर चढाई कर दी | रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की |

रानी ने संकल्प लिया की अंतिम सांस तक झाँसी के किले पर फिरंगियों का झंडा नहीं फहराने देंगी परन्तु सेना के एक सरदार ने गद्दारी की और अंग्रेजी सेना के लिए किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया | अंग्रेजी सेना किले में घुस आई. झाँसी के वीर सैनिको ने अपनी रानी के नेतृत्व में दृढ़ता से दुश्मन का सामना किया | शत्रु की सेना ने झाँसी की सेना को घेर लिया | किले के मुख्यद्वार के रक्षक सरदार खुदाबख्स और तोपखाने के अधिकारी सरदार गुलाम गौंस खान की वीरतापूर्ण लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए |

Rani Lakshmi Bai Essay in Hindi

ऐसे समय में रानी को उनके विश्वासपात्र सरदारों ने कालपी जाने की सलाह दी| रानी अपनी सेना को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी | परन्तु उनके सेनानियों ने उनसे अनुरोध करते हुए कहा ” महारानी, आप हमारी शक्ति है | आपका जीवित रहना हमारे लिए बहुत जरुरी है यदि आपको कुछ हो गया तो अंग्रेज सेना झाँसी पर अधिकार कर लेगी |

समय की गंभीरता को देखते हुए, अपने राज्य की भलाई के लिए रानी लक्ष्मीबाई झाँसी छोड़ने के लिए राजी हो गयी | उन्हें वहां से सुरक्षित निकालने के लिए एक योजना बनाई गयी | इस योजना में झलकारी बाई ने प्रमुख भूमिका निभाई थी |

गंभीर रूप से घायल होने पर भी वे वीरतापूर्वक लड़ती रही | अंततः अंग्रेजो को रानी व उनके साथियों से हार मानकर मैदान छोड़ना पड़ा |

घायल रानी को उनके साथी बाबा गंगादास की कुटिया में ले गये. पीड़ा के बावजूद रानी के चेहरे पर दिव्य तेज था. अत्यधिक घायल होने के कारण रानी वीरगति को प्राप्त हो गई और क्रान्ति की यह ज्योति सदा के लिए लुप्त हो गयी |

रानी लक्ष्मी बाई की म्रत्यु:-

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi 

झलकारी बाई रानी के प्रति पुर्णतः समर्पित थी | उनमे देश – प्रेम की भावना कूट – कूट कर भरी थी | जब रानी को किले से सुरक्षित निकालने की योजना बनाई गई तो झलकारी बाई ने रानी के वेश में युद्ध करने के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया | उनके रण – कौशल व् रंगरूप को देखकर अंग्रेज भ्रम में पड़ गये | उन्होंने वीरतापूर्वक अंग्रेजो का सामना किया और उन्हें युद्ध में उलझाए रही |

झलकारी बाई की सच्चाई जानकर एक अंग्रेज स्टुअर्ट बोला- क्या यह लड़की पागल हो गयी है ? एक दूसरे अधिकारी ह्यूरोज ने सिर हिला कर कहा- नहीं स्टुअर्ट, अगर भारत की एक प्रतिशत स्त्रियाँ भी इस लड़की की तरह देश – प्रेम में पागल हो जाएँ तो हमें अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति सहित यह देश छोड़ना पड़ेगा |

जनरल ह्यूरोज ने झलकारी बाई को बंदी बना लिया परन्तु एक सप्ताह बाद छोड़ दिया | अपनी मातृभूमि एवं महारानी लक्ष्मीबाई की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाली झलकारी बाई शौर्य और वीरता के कारण देशवासियों के लिए आदर्श बन गई-

अपना यश, कीर्ति लिए,
जब आहुति देती है नारी  !!
तब तब पैदा होती है
इस धरती पर झलकारी  !!

उधर झाँसी छोड़ने के बाद रानी अपने कुछ सैनिको के साथ अपना घोडा कालपी की तरफ दौड़ा रही थी | पीछा करते सैनिको ने रानी को देखते ही उन पर गोलियाँ दागनी शुरू कर दी| एक गोली रानी की जांघ में जा लगी | रानी घायल और थकी हुई थी, परन्तु उनकी वीरता और साहस में कोई कमी नहीं आई थी |

कालपी की ओर घोडा दौड़ाते हुए अचानक मार्ग में एक नाला आया. नाले को पार करने के प्रयास में घोडा गिर गया | इस बीच अंग्रेज घुड़सवार निकट आ गये | एक अंग्रेज ने रानी के सिर पर प्रहार किया और उनके ह्रदय में संगीन से वार किया | गंभीर रूप से घायल होने पर भी वे वीरतापूर्वक लड़ती रही | अंततः अंग्रेजो को रानी व उनके साथियों से हार मानकर मैदान छोड़ना पड़ा |

Rani Lakshmi Bai Essay in Hindi

घायल रानी को उनके साथी बाबा गंगादास की कुटिया में ले गये | अत्यधिक घायल होने के कारण रानी वीरगति को प्राप्त हो गई और क्रान्ति की यह ज्योति सदा के लिए लुप्त हो गयी |

18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक खतरनाक भी थी।

आज भी उनकी वीरता के गीत गाये जाते है-

बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी..!!

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